विकास धाकड़/मुंबई। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी शिष्या साध्वी श्री राकेश कुमारी जी आदि ठाणा 4 के पावन सान्निध्य में भिक्षु त्रिशताब्दी जन्म वर्ष की सम्पन्नता के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। साध्वी श्री जी के नवकार मंत्र से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। सभी साध्वीयों ने मिलकर भिक्षु म्हारे प्रगट्याजी एवं सुगुरू को वंदन बारंबार का सुमधुर संगान किया।
साध्वीश्री मलय विभाजी,साध्वीश्री विपुल यशा जी एवं साध्वी श्री जी चेतस्वी प्रभा जी ने मिलकर भिक्षु स्वामी के गुणों एवं संयम यात्रा की शब्द चित्र के माध्यम से बहुत ही रोचक प्रस्तुति दी।साध्वी श्री राकेश कुमारी जी ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में आचार्य भिक्षु के जीवन-दर्शन एवं महान व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनकी वंशावली का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने वीतरागता के पथ पर चलते हुए सत्य की क्रांति का शंखनाद किया तथा आगमसम्मत सिद्धांतों को निर्भीकता के साथ समाज के समक्ष रखा। उनके जीवन में न राग था, न द्वेष; वे सदैव सत्य, समता और निष्पक्षता के पक्षधर रहे।
साध्वी श्री जी ने अपनी स्वरचित गीतिका प्रस्तुत करते हुए भावपूर्ण शब्दों में कहा, “मंगलवार को आए, मंगलवार को गए और इस संसार को मंगलमय पथ प्रदान कर गए। उन्होंने कहा कि दीपां माता की कुक्षि से जन्मे उस परम पुण्यशाली प्रकाश पुरुष ने अपने तप, त्याग और ज्ञान के आलोक से संपूर्ण विश्व को प्रकाशित किया। साध्वीश्री जी ने कहा कि अनुशासन, मर्यादा और सुदृढ़ संगठन तेरापंथ धर्मसंघ की अमूल्य पहचान हैं, जिसकी नींव आचार्य भिक्षु ने रखी। उनका शासन चित्त को समाधि देने वाला और चिंता को शांति प्रदान करने वाला है। उन्होंने कहा कि हम सभी इस धर्मशासन के प्रति कृतज्ञ हैं।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में जो व्यक्ति उपलब्धियों और सम्मान को प्राप्त कर अहंकार में डूब जाता है, वह अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है। इसलिए विनम्रता, साधना और संयम के साथ आगे बढ़ना ही आचार्य भिक्षु के जीवन का सच्चा संदेश है। साध्वीश्री के मंगलपाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ।
विलेपार्ले गोयल भवन में भिक्षु त्रिशताब्दी जन्म वर्ष की सम्पन्नता के उपलक्ष्य में भव्य भिक्षु भक्ति का आयोजन

