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Reading: वास्तविकता को दर्शाती ‘खामियाज़ा’
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वास्तविकता को दर्शाती ‘खामियाज़ा’

Last updated: January 12, 2019 7:11 pm
Surabhi Saloni
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3 Min Read
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हर इंसान की जिंदगी में कोई न कोई हादसा होता है पर इस हादसे के कारण जिंदगी गवाँ कर खमियाजा चुकाना पड़ता है । इसी कहानी से ओतप्रोत ‘ खामियाजा ‘ फ़िल्म की कहानी है । निर्माता राजेश त्रिपाठी की दीक्षित कॉल द्वारा निर्देशित खामियाजा फ़िल्म एक आम इंसान की ज़िंदगी को झकझोर देगी । इस फ़िल्म की कहानी वास्तविकता को दर्शाती है । इसमें मनोरंजन के नाम पर बनावटीपन और अतिसंयोक्ति नहीं दर्शाया गया । अपितु इसमें एक आम जिंदगी में होने वाली जद्दोजहद का ज़िक्र है । फ़िल्म का संगीत कर्णप्रिय बन पड़ा है । फ़िल्म के कलाकार हेरंब त्रिपाठी , पीयाली मुंशी , सुनील थापा ,शक्कू राणा आदि ने बेहतरीन काम किया है ।

फ़िल्म की कहानी लखनऊ के रहने वाला एक अनाथ युवक अभिमन्यु की है । एक दिन उसकी प्रेमिका पलक उसे अपने पिता से शादी की बात करने के लिए वडोदरा गुजरात बुलाती है । पलक के पिता उसे अनाथ जानकर दोनों की शादी से इनकार कर उसे हरामी कह देता है जिससे वह दुखी होकर घर से बाहर निकलता है और रास्ते में वह उसी उधेड़बुन में रहता है तभी एक अनजान से टकराता है , अनजान व्यक्ति उसे गाली देता है जिससे आगबबूला होकर अभिमन्यु उस व्यक्ति के साथ उसके साथियों की पिटाई करता है । दरअसल वह अनजान एक कॉन्ट्रैक्ट किलर होता है जिसे शहर के मंत्री ने एक समाजसेवक सत्यप्रकाश को अपने रास्ते से हटाने के लिए भेजा होता है । अभिमन्यु को अपने दुश्मन का साथी समझकर मंत्री दोनों की हत्या के लिए इंस्पेक्टर बशारत अली खान को आदेश देता है । फर्जी एनकाउंटर के तहत भ्रष्ट इंस्पेक्टर खान सत्यप्रकाश और अभिमन्यु को गोली मारकर खत्म कर देता है लेकिन अभिमन्यु बच जाता है ।
अभिमन्यु और खान के बीच आंख मिचौली का खेल शुरू होता है लेकिन अंत में वह एक आम आदमी की तरह पुलिस की गोली का शिकार हो जाता है । निर्देशक दीक्षित कौल ने फ़िल्म के जरिये वास्तविकता ज़ाहिर करने की कोशिश की है कि किस प्रकार हमारे समाज में भ्रष्ट तंत्र हावी है , बेगुनाहों को सज़ा मिल रही है , बेईमानों की मनमानी चल रही है । भ्रष्ट प्रशासन और राजनीतिक चक्रव्यूह में यदि आम इंसान फंसा तो उसका हाल महाभारत काल के अभिमन्यु जैसा ही होगा ।
– गायत्री साहू

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