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Reading: अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस हेतु एक माह का जागरुकता व जवाबदेही डिजिटल कार्यक्रम आरंभ
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अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस हेतु एक माह का जागरुकता व जवाबदेही डिजिटल कार्यक्रम आरंभ

Last updated: May 5, 2020 8:12 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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कानपुर: सतत विकास लक्ष्यों (वैश्विक लक्ष्यों) को सुदृढ़्ता प्रदान करने के लिये कानपुर स्थित हस्तशिल्प उत्पादों की निर्माता फर्म ‘स्वप्निल सौंदर्य’ द्वारा शुरु किये गये 10 वर्षीय डिजिटल अभियान ‘स्वप्निल सौंदर्य डेकेड ऑफ़ एक्शन फॉर एसडीजीज़’ के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण के लिये जागरुकता व जवाबदेही हेतु 01 माह के डिजिटल कार्यक्रम का आरंभ दिनांक 05 मई 2020 को किया गया।
05 जून 2020 अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस तक लगातार चलने वाले इस कार्यक्रम के बारे में प्रकाश डालते हुए चित्रकार ऋषभ शुक्ला ने बताया कि कोविड 19 महामारी के नकारात्मक प्रभावों के बारे में रोज़ पढ़ – देख हम सभी बेहद आहत हैं। सम्पूर्ण भारत एकजुट्ता व निडरता के साथ इस महामारी पर विजय प्राप्त करने के लिये प्रयासरत है। पर यदि हम कोविड 19 से बचाव हेतु लॉकडाउन के सकारात्मक पहलुओं पर नज़र डालें तो देशभर में प्रदूषण का स्तर काफी कम हुआ है। लोग साफ नीले आसमान की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं । पर्यावरण पर लॉकडाउन के सकारात्मक प्रभाव को देखते हुए लॉकडाउन के बाद भी यदि हम थोड़ी सूझ- बूझ के साथ ज़िंदगी की नई पारी की शुरुआत करें तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा व दशा में निरंतर सुधार ला पाने में सक्षम होंगे। हमें सतत विकास की अवधारणा को मद्देनज़र रखते हुए ग्रीन इंड्स्ट्रीज़, प्रदूषण विहीन ऊर्जा, सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। विभिन्न शिफ्ट्स में घर पर कार्य को भी विकल्प के तौर पर चुनना अनुपयुक्त न होगा । हम सभी को देश के 80 शहरों को 2027 तक 80 प्रतिशत प्रदूषण रहित बनने का संकल्प लेना होगा । तभी सही मायनों में हम 2027 में भारत की आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ का उत्सव मना पायेंगे ।
फैशन–ज्वेलरी डिज़ाइनर स्वप्निल शुक्ला ने पर्यावरण संरक्षण के सम्बंध में अपने विचार प्रकट करते हुए बताया कि प्रदूषण को लेकर प्रमुख तौर पर तीन कानून हैं: द एयर (प्रीवेंशन एण्ड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट 1981, द वॉटर (प्रीवेंशन एण्ड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट 1974 और द एनवॉयरमेंट (प्रोटेक्शन) एक्ट 1986, इन कानूनों के सख्त लागूकरण व क्रियान्वयन की जरुरत है ।
भाई बहन ऋषभ व स्वप्निल शुक्ला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक खुले पत्र द्वारा पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित मूलभूत बिंदुओं के क्रियान्वयन की अपील की है ।
इस डिजिटल कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण के मुद्दे पर बेंगलुरु निवासी आईटी क्षेत्र से जुड़े महेश सिद्दाना ( टीम लीड ) ने कहा कि जैसे हम अपना व अपने परिवार का ख्याल रखते हैं , वैसे ही हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम ‘जीवंत माध्यम’ अर्थात पर्यावरण की देखभाल करें। हम मानव ही पर्यावरण सम्बंधी नुकसान के लिये ज़िम्मेदार हैं। हमें धरती माँ की तरह पर्यावरण के लिये दयालु बनना होगा तकि इसे खुद के लिये व अन्य जीवों के लिये सुरक्षित रखा जा सके।
मुम्बई के डॉ घर्म पोपट का कहना है कि जितना ज्यादा हो सके, उतना प्लास्टिक उत्पादों का उपयोग करने से दूरी बनायें। एक डेंटिस्ट के तौर पर मैंने, कागज़ के गिलास व ऑटोक्लेवेबल स्टेनलेस स्टील के गिलास का उपयोग करना शुरु किया है। जल संरक्षण के लिये हेड शॉवर के बजाय बाल्टी व ट्म्बलर का उपयोग कर रहा हूँ।
दुबई में सलाहकार के रुप में कार्यरत प्रणव शाह ने पर्यावरण संरक्षण पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि घर पर प्लास्टिक उत्पादों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है । सब्जी या किराने का सामान खरीदने हेतु जूट बैग्स का इस्तेमाल किया जाना चाहिये। फ्लोर मैट बनाने हेतु पुराने कपड़ों का पुन: प्रयोग करना चाहिये ।
भोपाल के आर्किटेक्ट (वास्तुकार) अंशुल मिश्रा ने बताया कि लोगों को सतत विकास की अवधारणा को आत्मसात करना होगा । हम सभी को स्वस्थ जीवन जीने के लिये कम से कम 07 पेड़ों की आवश्यकता होती है । अत: हम सभी को अपने घर के आस- पास कम से कम 07 पेड़ लगा कर उनकी देखभाल करनी चाहिये ।
एविएशन ( उड्ड्यन उद्योग) क्षेत्र में कस्टमर सर्विस ऑफीसर के पद पर आसीन मेघना का कहना है कि मैं यह नहीं बताऊंगी कि पर्यावरण संरक्षण के लिये क्या करना या क्या नहीं करना चाहिये क्योंकि हर कोई इस अहम मुद्दे से परिचित है । हमें अपने व अपने परिवार के लिये पर्यावरण के लिये ठोस रणनीति को कार्य रुप में परिणत करने की जरुरत है । अगर हर कोई पर्यावरण संरक्षण के बारें सोचेगा व कार्य करेगा तो हम वैश्विक स्तर पर बदलाव ला सकते हैं। छोटे-छोटे कदम व प्रयास भी बड़े सकारात्मक प्रभाव से हमारा साक्षात्कार करा सकते हैं।
मुम्बई में बिजनेस एनालिस्ट (व्यावसायिक विश्लेषक) के तौर पर कार्य करने वाले आलोक अग्रवाल का मानना है कि पर्यावरण नुकसान की मुख्य अपराधी हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति है। विशेष रुप से भोजन की बर्बादी पर्यावरण पर भारी दबाव डालती है। हमें अधिकता व अपव्यय से बचते हुए सोच विचार कर वस्तुओं का उपभोग करना चाहिये। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट (विशेष रुप से विकासशील देश जैसे अफ्रीका व एशिया) । अधिक लोगों का अर्थ है कि इन जन समुदायों के लिये अधिक खाना, घर, कपड़े, मनोरंजन क इंतज़ाम व पर्यावरण दोहन की बढ़ोत्तरी ।
बी.बी.ए के छात्र अराध्य कौशिक ने कहा कि इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि विचारशील व संकल्पबद्ध नागरिकों का एक छोटा समूह भी दुनिया बदल सकता है । हमें एकजुटता के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सकारात्मक बदलाव लाने होंगे। सदाबहार वातावरण के बिना हम एक भी दिन बेहतर ज़िंदगी नहीं जी सकते।
इस डिजिटल अभियान की आगामी योजनाओं पर चर्चा करते हुए ऋषभ शुक्ला ने बताया कि जल्द ही हम वृत्तचित्र, कला, साहित्य के संगम द्वारा पर्यावरण संरक्षण के दैनिक उपायों को जन जन तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे व डिजिटल हस्ताक्षर अभियान को वैश्विक स्तर पर चलायेंगे।

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