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Reading: तेरापंथ की राजधानी में महातपस्वी महाश्रमण के 65वें जन्मोत्सव का भव्य आयोजन 
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तेरापंथ की राजधानी में महातपस्वी महाश्रमण के 65वें जन्मोत्सव का भव्य आयोजन 

Last updated: April 25, 2026 7:42 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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Highlights
  • ब्रह्म मुहूर्त में ही श्रद्धालुओं ने थाली व शंख ध्वनि से अपने आराध्य को किया वर्धापित
  • चतुर्विध धर्मसंघ ने अपने वर्तमान अधिशास्ता की अभिवंदना में दी अभिव्यक्ति 
  • दूगड़ परिवार के सदस्यों ने अपने कुल गौरव को अपनी प्रस्तुतियों से किया वर्धापित 
  • साध्वीवर्याजी ने अपने आराध्य के प्रकाशवान व पारदर्शी जीवन का किया वर्णन 
25.04.2026, शनिवार, लाडनूं। वैशाख शुक्ला नवमी। जैन विश्व भारती, लाडनूं का सुरम्य परिसर। ब्रह्म मुहूर्त का समय। थाली व शंख की मंगल ध्वनि से गुंजायमान हो उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के 65वें जन्मदिवस की मंगल बधाई दे रहे थे। संत समुदाय द्वारा अपने सुगुरु के चरणों की अभिवंदना और थाली व शंख की मंगल ध्वनि जन-जन के मन को आह्लादित कर रहा था। सभी अपने वर्तमान अधिशास्ता की अभिवंदना में तन्मयता से जुड़े हुए थे। आचार्यश्री अपने प्रवास स्थल से सुधर्मा सभा में पधारे, जहां श्रावक-श्राविकाओं व मुख्यमुनिश्री सहित संत समुदाय ने अपने आराध्य के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना करते हुए विभिन्न प्रस्तुतियां दीं। सूर्योदय के तत्काल बाद साध्वीप्रमुखाजी आदि साध्वियों का विशाल समुदाय भी गुरु सन्निधि में उपस्थित हुआ। साध्वीप्रमुखाजी, साध्वीवर्याजी ने आचार्यश्री की अभिवंदना करते हुए 65वें जन्मदिवस की मंगलकामना की। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने भी गीत का संगान किया। तेरापंथ धर्मसंघ के विभिन्न केन्द्रीय संस्थाओं के पदाधिकारियों, योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति तथा लाडनूं तेरापंथ समाज आदि ने अपनी-अपनी प्रस्तुति के माध्यम से अपने गुरुदेव को वर्धापित किया। तेरापंथ की राजधानी में पहली बार आयोजित हो रहे आचार्यश्री के जन्मोत्सव का उत्साह जन-जन में देखने को मिल रहा था।
आचार्यश्री के 65वें जन्मोत्सव को लेकर पूरे जैन विश्व भारती परिसर में अलग ही उत्साह छाया हुआ था। जैन विश्व भारती में स्थित महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल के नन्हें विद्यार्थियों ने भी आचार्यश्री को वर्धापित किया। जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के छात्र गणों ने भी आचार्य श्री का अभिनंदन किया। तदुपरान्त आचार्यश्री प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए पुनः सुधर्मा सभा में पधारे तो आज मानों श्रद्धा का सैलाब उमड़ता नजर आ रहा था। चतुर्विध धर्मसंघ की विशाल उपस्थिति से विशाल सुधर्मा सभा भी मानों बौना साबित हो रहा था।
आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ जन्मोत्सव के कार्यक्रम का मंगल शुभारम्भ हुआ। तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं ने गीत का संगान किया। योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री प्रमोद ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुमुक्षु बहनों ने अपनी प्रस्तुति देते हुए अपने आराध्य को वर्धापित किया। शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी व शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। समणीवृंद ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री का संसारपक्षीया परिवार से संदर्भित साध्वी सुमतिप्रभाजी, साध्वी चारित्रयशाजी, साध्वी विशालयशाजी ने आचार्यश्री को वर्धापित किया। आचार्यश्री के संसारपक्षीया भाई श्री श्रीचंद दूगड़, श्री महेन्द्र दूगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। दूगड़ परिवार ने गीत का संगान किया। श्रीमती संतोषदेवी बरड़िया, श्रीमती विजयादेवी मालू ने अपनी अभिव्यक्ति दी। दो नन्हें बालकों ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी। सुश्री मैत्री बोथरा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालिका आद्या बच्छावत ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशाजी ने आज के अवसर पर आचार्यश्री को वर्धापित करते हुए आचार्यश्री के प्रकाशवान व पारदर्शी व्यक्तित्व का वर्णन किया। संस्था शिरोमणि जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र नाहटा ने अपने आराध्य को वर्धापित किया।
महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने 65वें जन्मोत्सव पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करने से पूर्व ध्यान का प्रयोग कराने के उपरान्त पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न हो सकता है कि जन्म क्यों होता है? एक दिन में कितने बच्चों का तो कितने पशुओं का और भी कितने-कितने प्राणियों का जन्म होता होगा। जन्म के संदर्भ में कहा गया है कि प्रमादी जीव बार-बार जन्म लेता है, गर्भ में आता है। आदमी के भीतर चार कषाय होते हैं- क्रोध, मान, माया और लोभ। इन कषायों की प्रबलता के कारण अगले जन्म के मूल का अभिसिंचन किया करते हैं। जन्म को भी दुःख कहा गया है, लेकिन मानव जीवन मिलना भी मानों महत्त्वपूर्ण है। मानव जन्म लिए बिना जन्म-मरण से मुक्ति नहीं मिल सकती, इसलिए मानव जन्म का अपना महत्त्व है। जन्म लेना भाग्य की बात होती है, लेकिन पुरुषार्थ करना अपने हाथ की बात होती है। आदमी को यह सोचना चाहिए कि जन्म तो भाग्य मिल गया, लेकिन अब मुझे सत्पुरुषार्थ करना चाहिए। वह मानव मानों धन्य होता है तो अपने जीवन में सत्पुरुषार्थ करता है, शुभ योगों की प्रवृत्ति में रहता है और अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करता है। सांसारिक कार्यों का भी अपना मूल्य हो सकता है, किन्तु अध्यात्म की दृष्टि से देखा जाए तो धर्म की साधना बहुत बड़ी पूंजी होती है।
आदमी को अपने आगे के विषय में सोचने का प्रयास करना चाहिए। लोगों को अनुकूलता मिल जाए, यह तो पूर्वजन्म की कमाई की बात होती है, लेकिन अगला जन्म कितना अच्छा हो अथवा जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिले, इसका प्रयास करना चाहिए। आज नवमी का दिन है। यहां दो द्विदिवसीय संघीय आयोजन हो रहा है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि तेरापंथ परिवार का मिल जाना बहुत सौभाग्य की बात है। आचार्यश्री भिक्षु के इस परिवार में करीब बावन वर्षों से रह रहा हूं। आचार्यश्री ने इस अवसर पर शासनमाता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी का स्मरण करते हुए कहा कि इस योगक्षेम वर्ष के आयोजन में उनका भी निवेदन था और मैंने उनका निवेदन स्वीकार कर लिया था। इस तेरापंथ परिवार में हम सभी फलते-फूलते रहें।
जैन विश्व भारती के मुख्य न्यासी श्री जयंतीलाल सुराणा, जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर श्री बच्छराज दूगड़, अमृतवाणी के अध्यक्ष श्री ललितकुमार दूगड़, श्री तेजकरण बोथरा, श्री नरपत दूगड़, श्री तेजकरण सुराणा, श्रीमती प्रभा दूगड़, योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री निर्मल कोटेचा, श्री संजय खटेड़, श्री राजेश दूगड़, श्री निर्मल नौलखा, श्री सूरजमल नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री गंगानगर सभा के अध्यक्ष श्री भोजराज जैन ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तथा श्रीगंगानगर तेरापंथ समाज ने अपने यहां आयोजित होने वाले आचार्यश्री के आगामी जन्मोत्सव व पट्टोत्सव से संदर्भित बैनर का लोकार्पण किया।

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