भरतकुमार सोलंकी ने केंद्रीय और महाराष्ट्र स्वास्थ्य मंत्री को लिखा पत्र
मुंबई। देशभर में बीमा धारकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को सहज और सहानुभूतिपूर्ण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुझाव जाने-माने वित्तीय विशेषज्ञ और जनहित विषयों पर मुखर रहने वाले भरतकुमार सोलंकी द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर दिया गया हैं।उन्होंने मांग की हैं कि महाराष्ट्र के सभी अस्पतालों में टीपीए डेस्क पर प्री-हॉस्पिटलाइजेशन क्लेम प्रोसेस की सुविधा तत्काल प्रभाव से शुरू की जाए, ताकि बीमा धारकों को इलाज शुरू होने से पहले की जांच और परामर्श खर्च के लिए राहत मिल सके।
बीमा धारक की जेब पर दोहरी मार
भरतकुमार सोलंकी ने इस पत्र में लिखा हैं कि आज बीमाधारक सालों तक बीमा कंपनियों को भारी भरकम प्रीमियम चुकाते हैं, लेकिन जब अस्पताल जाने की जरूरत पड़ती हैं, तो उन्हें न केवल पहले की जांच, स्कैन, खून की रिपोर्ट, डॉक्टर कंसल्टेशन जैसे प्री-हॉस्पिटलाइजेशन खर्च अपनी जेब से उठाने पड़ते हैं, बल्कि कैशलेस सुविधा होने के बावजूद अस्पताल द्वारा भारी डिपॉजिट राशि की भी मांग की जाती हैं। यह व्यवस्था बीमाधारक की भावनाओं और आर्थिक स्थिति के साथ अन्याय हैं।
अस्पतालों का भरोसा किस पर नहीं?
भरतकुमार सोलंकी ने एक व्यावसायिक दृष्टांत देते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति केवल पैन कार्ड, आधार कार्ड और सिबिल रिकॉर्ड के आधार पर इलेक्ट्रॉनिक शोरूम से टीवी, फ्रिज, स्कूटर और कार बिना एक रुपया दिए ईएमआई पर खरीद सकता हैं, तो वही व्यक्ति जब अस्पताल में दाखिल होता हैं, तो उससे एकमुश्त डिपॉजिट क्यों मांगा जाता हैं? वह भी तब जब उसका बीमा रिकॉर्ड, पॉलिसी और क्लेम का पूरा इतिहास उपलब्ध होता हैं।
बीमा का भरोसा, या सिर्फ कागज़ी दिलासा?
यह विडंबना ही हैं कि वर्षों की बीमा पॉलिसी, सही रिकॉर्ड और सबूतों के बावजूद, बीमाधारक से अविश्वास का व्यवहार किया जाता हैं। जबकि प्रीमियम समय पर नहीं भरने पर तो बीमा कंपनी एक दिन की देरी पर भी क्लेम खारिज कर देती हैं, पर जब बीमाधारक को सुविधा देने की बारी आती हैं तो उसे “प्रक्रिया में है” जैसे जवाबों में उलझा दिया जाता हैं।
मांग और सुझाव
भरतकुमार सोलंकी ने सरकार से अनुरोध किया हैं कि—
▪️सभी अस्पतालों में टीपीए डेस्क पर प्री-हॉस्पिटलाइजेशन क्लेम प्रोसेस तुरंत शुरू किया जाए, ताकि बीमाधारक को शुरुआती खर्च अपनी जेब से ना उठाना पड़े।
▪️कैशलेस सुविधा वाले अस्पतालों में डिपॉजिट की अनिवार्यता समाप्त की जाए, या पॉलिसी और क्लेम इतिहास के आधार पर भरोसे की व्यवस्था बनाई जाए।
▪️बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच तालमेल मज़बूत कर, बीमाधारकों के लिए व्यवहारिक और सम्मानजनक प्रणाली बनाई जाए।
उन्होंने कहा कि मुंबई जैसे मेडिकल हब में यदि यह व्यवस्था लागू होती हैं, तो पूरे देश में इसका आदर्श उदाहरण बन सकता हैं। यह सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं होगा, बल्कि बीमाधारकों के आत्मसम्मान को भी पुनः स्थापित करेगा।

