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Reading: स्वागत 2020 – चुनौतियां भी, उम्मीदें भी
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स्वागत 2020 – चुनौतियां भी, उम्मीदें भी

Last updated: January 2, 2020 11:23 am
Surabhi Saloni
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13 Min Read
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आइए हम सभी 2019 की विदायी के साथ ही 2020 का स्वागत करें। उम्मीद करें कि आने वाला वर्ष शांति, सौहार्द, प्रगति और भाईचारे की मिसाल बनेगा। यूं तो हम यह कामना हर साल करते हैं, कई बार पूरी होती है तो कई बार नहीं भी। लेकिन यदि हम सकारात्मक विचार रखेंगे, तो सकारात्मकता जरूर देखने को मिलेगी। इन्हीं उम्मीदों के साथ उम्मीद करते हैं कि जितनी भी समस्याएं 2019 में थीं, उनमें से अधिकतर हमारी जिंदगी से बेदखल होगी तथा देश के हर नागरिक के जीवन में एक नई सुबह की दस्तक होगी।
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2020 की चुनौतियांः सन 2019 बीत गया और 2020 ने दस्तक दे दी है। देश में अस्थिरता है। एक तरफ सीएए एनआरसी को लेकर विवाद और प्रदर्शनों का दौर चल रहा है तो दूसरी तरह महंगाई, मंदी, शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा जैसे सवाल सामने मुंह बाए खड़े हैं। 2014 में भारी जीत के बाद 2019 में दोबारा सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने वैसे तो आम लोगों के हित में कई उल्लेखनीय कार्य किए जिसकी सराहना भी खूब हुई लेकिन वर्तमान चुनौतियां कई गुना ज्यादा जिससे पार पाना बेहद संघर्षपूर्ण है। इसके अलावा भी कई प्राकृतिक चुनौतियां भी हैं, जिनसे देश के लोगों को निपटना है।
शिक्षा-चिकित्साः देश में शिक्षा का बढ़ता िनजीकरण जहां देश के गरीब परिवारों के बच्चों से शिक्षा दूर होती जा रही है, वहीं चिकित्सा का भी लगभग यही हाल है। सरकारी अस्पतालों में लापरवाही और घुसखोरी की शिकायतों के बीच प्राइवेट अस्पतालों द्वारा लूट-खसोट चालू है। ऐसे में देश के आम लोगों को शिक्षा और चिकित्सा मुहैया कराना अभी भी चुनौती बनी हुई है। देखना होगा कि 2020 में हमारी सरकार इससे कैसे निपटती है।
आर्थिक मंदीः देश कई महीनों से आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। हाल यह है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर घटकर 4.5 फीसदी पर पहुंच गई है जो पिछले छह साल में सबसे कम है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष भी भारत को तुरंत कदम उठाने की सलाह दे चुका है।
महंगाई की मारः भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान है कि जनवरी से मार्च 2020 तक खाने-पीने की चीजों में महंगाई बढ़ेंगी। फिलहाल देश में खुदरा महंगाई दर 4.62 फीसदी से बढ़कर नवंबर 2019 में 5.54 फीसदी हो गई है। प्याज के दामों ने पहले ही लोगों को परेशान कर रखा है।
बढ़ती बेरोजगारीः भारत में बहुत से युवाओं को नौकरी की तलाश है। आलोचक मोदी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि रोजगार के मुद्दे पर उसने अपने वादे पूरे नहीं किए। बेरोजगारी दर 8.5 फीसदी हो गई है, जो पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा है. केंद्र सरकार के सामने देश में रोजगार के अवसर बढ़ाना इस समय एक बड़ी चुनौती है।
किसानों की आयः मोदी सरकार ने साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है लेकिन मौजूदा हालात में देश का किसान परेशान है। बहुत से किसान कर्ज की वजह से अपनी जान तक दे देते हैं। ऐसे में, यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिले।
भुखमरी और कुपोषणः संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। राष्ट्रीय पोषण मिशन का लक्ष्य 2020 तक बच्चों में कुपोषण को दूर करना है. लेकिन इस हिसाब से लक्ष्य अभी बहुत दूर है।
प्रदूषणः भारत के लिए साल दर साल प्रदूषण बड़ा खतरा बनता जा रहा है। उत्तर भारत में हर साल अक्टूबर और नवंबर के आखिरी दिनों में हवा में प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुई। प्रदूषण के कारण बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर सबसे ज्यादा खतरा बना रहता है।
आतंकवादः भारत के सामने आतंकवाद अब भी बड़ी चुनौती है. सीमापार से हो रही गतिविधियों को रोकने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा भी देश के लिए अहम रहता है। हालांकि पाकिस्तान सीमापार आतंकवाद के आरोपों को खारिज करता है और इस मुद्दे को लेकर दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उलझते रहे हैं।
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वर्ष 2019 की विदायी और हेमंत सोरेन की ताजपोशी
वर्ष 2019 की विदायी की होते होते झारखंड में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में आदिवासी नेता हेमंत सोरेन की ताजपोशी पूरे साल लोगों को याद रहेगी। एक सामान्य परिवार में 10 अगस्त 1975 में जन्मे झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन शिबू सोरेन के बेटे हैं तथा इससे पहले वे अर्जुन मुंडा मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री थे। शिबू सोरेन ने यहां केंद्र व राज्य में सत्तासीन भाजपा को शिकस्त दी है। उनसे पहले झारखंड की सत्ता पर भाजपा का कब्जा था, जिसके मुख्यमंत्री रघुवर दास थे। इस बार रघुवर दास खुद अपनी सीट बचाने में भी नाकाम रहे। हेमंत झारखंड के बरहैट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं।
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नये वर्ष में भारत को नया रंग दें
जीवन में मौसम ही नहीं बदलता माहौल, मकसद, मूल्य और मूड सभी कुछ परिस्थिति और परिवेश के परिप्रेक्ष्य में बदलता है। और ये बदलते दौर जीवन को कई बार विचित्र नए अर्थ दे जाते हैं। नया वर्ष- 2020 ऐसे ही नये अर्थ और दिशाएं देने को सम्मुख खड़ा है। ऐसा लगता है कि जिन्दगी के सारे आदर्श और सारी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता स्वयं में समेटकर यह वर्ष न केवल त्यौहारों एवं पर्वों बल्कि राजनीति, अर्थनीति एवं समाज-व्यवस्था को नया माहौल देने को उपस्थित है। ऐसे ही माहौल में मनुष्य भीतर से खुलता है वक्त का पारदर्शी टुकड़ा बनकर।
भला ऐसा कौन-सा इंसान होगा, जिसे त्यौहारों एवं पर्वों का माहौल आनंदित न करता हो, या राजनीति की चालों से कौन अछूता रहता है। ये पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करते हंै तो राजनीति राष्ट्र को उन्नति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर करती है । शुष्क जीवन-व्यवहार के बोझ के नीचे दबा हुआ इंसान इस खुशनुमा मौसम एवं माहौल में थोड़ी-सी मुक्त सांस लेकर आराम महसूस करता है। जीवन की जड़ता उत्साह में बदल जाती है। हमारा देश ऐसे ही उत्सवों एवं त्यौहारों की वैभवता से सम्पन्न है, एक विशेष और आदर्श संस्कृति का वाहक है, फिर भी यह सब हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में अभिव्यक्त क्यों नहीं हो पाता? क्यों राष्ट्रीयता के नाम पर हम इतने बंटे एवं विभाजित है? क्यों बार-बार नारी की अस्मिता को तार-तार कर दिया जाता है, क्यों सामूहिक बलात्कार की घटनाएं तमाम विकास की तस्वीर को धुंधला जाती है, यह जीवन इतना बंधा-बंधा सा क्यों है? ये कैसी दीवारें हैं? इतनी गुलामी, इतने दुख कहां से इस देश के हिस्से में आ गए?
हजारों-हजारों साल से जिस प्रकृति ने भारतीय मन को आकार दिया था, उसे रचा था, भारतीयता की एक अलग छवि का निर्माण हुआ, यहां के इंसानों की इंसानियत ने दुनिया को आकर्षित किया, संस्कृति एवं संस्कारों, जीवन-मूल्यों की एक नई पहचान बनी। ऐसा क्या हुआ कि पिछली कुछ सदियों में उसके साथ कुछ गलत हुआ है, और वह गलत दिनोंदिन गहराता गया है जिससे सारा माहौल ही प्रदूषित हो गया है, जीवन के सारे रंग ही फिके पड़ गये हैं, हम अपने ही भीतर की हरियाली से वंचित हो गए लोग हैं। न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार। न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में सामूहिकता का स्वर, बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी। यूं लगता है सब कुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में। क्या यह प्रतीक्षा झूठी है? क्या यह अगवानी अर्थशून्य है? मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है। इसलिये कल पर कुछ मत छोड़िए। कल जो बीत गया और कल जो आने वाला है- दोनों ही हमारी पीठ के समान हैं, जिसे हम देख नहीं सकते। आज हमारी हथेली है, जिसकी रेखाओं को हम देख सकते हैं। हम आज एक नए जीवन के द्वार पर खड़े हैं। अतीत के सारे इतिहास को एक नया रूप दे देने वाले संसाधनों के साथ। इन संसाधनों में सबसे प्रमुख साधन विचार हैµऐसा विचार जो विश्लेषणों और कारणों तक पहुंचता है। बीते जमाने में महावीर इसी विचार के पथ पर चल दुख के कारणांे तक पहुंचे थे, पर इसके पहले उन्होंने राजगृह से निकल, जाने कितने वनों और बस्तियों की यात्राएं कीं। यह ज्ञान की, संवेदना की, बोध की यात्रा थी। ‘स्टैण्डर्ड आॅफ लाइफ’ के नाम पर भौतिकवाद, सुविधावाद और अपसंस्कारों का जो समावेश भारतीय संस्कृति एवं जीवन-शैली में हुआ या हो रहा है, वह निश्चित ही चिन्तनीय है। इस हिमालयी भूल का प्रतिकार या प्रायश्चित आने वाले साल-2020 में हो जाये तो बहुत शुभ है। अन्यथा आने वाली पीढ़िया अपने पुरुखों को कोसे बिना नहीं रहेगी।
बदलाव की संस्कृति में सवालिया नजर केवल भारतीय पर्व और त्यौहार पर ही नहीं, बल्कि राजनीति पर टिकी है, क्योंकि हाल के राजनीतिक परिदृश्यों ने राममंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक कानून, एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की संभावना कोे पूरजोर तरीके से प्रकट किया है। इन मुद्दों ने वर्तमान नेतृत्व की संभावनाओं पर भी मोहर लगायी गयी है। हमें राजनीति को व्यक्ति नहीं, विचार और विश्वास आधारित बनाना होगा। चेहरा नहीं, चरित्र को प्राथमिकता देनी होगी। आज भी हम पिछड़े हंै, असुरक्षित हंै, अशिक्षित हंै। कभी हमें विश्व स्तर पर भ्रष्टाचारी होने का तगमा पकड़ा दिया जाता है तो कभी साम्प्रदायिकता का। कभी गरीबी का तो कभी अशिक्षा का, इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा? क्या विश्व के हासिए में उभरती भारत की इस तस्वीर को हम कोई नया रंग नहीं दे सकते? हमें त्यौहारों एवं पर्वों ही नहीं बल्कि राजनीति की संस्कृति को भी समृृद्ध बनाना होगा। हर दिन एक तलाश होµअपनी और उस अछोर जीवन की, उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है। किसी भोर का उगता सूरज, कोई बल खाती नदी, दूर तक फैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई सिंदूरी शाम, दूर गांव से आती कोई ढोलक की थाप, पीछे छूटती दृश्यावलियंा… हमारे भीतर रच-बस जाती हैं। यही सब जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर में जगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिनकी आभा में हम उस सब को पहचान पाते हैं जो जीवन है, जो हमारी पहचान के मानक हैं। हम भारत के लोग इसलिए विशिष्ट नहीं हैं कि हम ‘जगतगुरु’ रहे हैं, या हम महान आध्यात्मिक अतीत रखते हैं। हम विशिष्ट इसलिए हैं कि हमारे पास मानवता के सबसे प्राचीन और गहरे अनुभव हैं। ये अनुभव सिर्फ इतिहास और संस्कृति के अनुभव नहीं हैं, इसमें नदियों का प्रवाह, बदलते मौसमों की खुशबू, विविध त्यौहारों की सांस्कृतिक आभा, प्रकृति का विराट लीला एवं लोकतंत्र की सशक्त शासन-प्रणाली का संसार समाया हुआ है। हमारा हर दिन पर्व और त्यौहार बने, हमारी जीवनशैली दिशासूचक बने। गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, वह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। कुतुबनुमा बने, जो हर स्थिति मे ंसही दिशा बताता है।
– ललित गर्ग

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