लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘बिना सम्यक्त्व के चारित्र कहां?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि सम्यक्त्व और चारित्र के संदर्भ में दो नियम बताए गए हैं और दो विकल्प बताए गए हैं। सम्यक्त्व विहीन चारित्र नहीं हो सकता। चारित्र का मूल तत्त्व सम्यक्त्व ही है। बिना सम्यक्त्व के चारित्र नहीं हो सकता। सम्यक्त्व को शरीर की आत्मा के रूप में भी मान सकते हैं। दूसरा नियम बताया गया कि सम्यक् दर्शन है तो चारित्र हो ही, ऐसा कहा नहीं जा सकता। सम्यक्त्व की अवस्था में चारित्र हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। चारित्र के बिना सम्यक्त्व हो भी सकता है। सम्यक्त्व है, चारित्र नहीं। चारित्र है, सम्यक्त्व नहीं। सम्यक्त्व भी है और चारित्र भी है तथा न सम्यक्त्व है और न ही चारित्र है।
सम्यक्त्व और चारित्र एक साथ भी हो सकते हैं। सम्यक्त्व के बाद चारित्र आ सकता है, यह तो सामान्य बात है। यह सामान्य रूप से भी समझ आ जाती है। सम्यक्त्व और चारित्र साथ कैसे हो संभव हो सकता है। इस संदर्भ में एक प्रेरणा ली गई कि एक साधु छठे गुणस्थान में है। उसके भीतर सम्यक्तव और चारित्र दोनों है। उसके मन में संशय हो गया कि भावों में पहला गुणस्थान आ गया। साधु की चेतना जब पुनः पुष्ट होती है तो सम्यक्त्व और चारित्र एक साथ आ सकते हैं।
सम्यक्त्व और चारित्र दोनों ही कीमती चीजें हैं। इन दोनों के समान दुनिया में कोई रत्न नहीं हो सकता। सम्यक्त्व के बिना चारित्र तो मानों मृत शरीर के समान हो जाता है। इसलिए सम्यक्त्व का ज्यादा महत्त्व होता है। सम्यक्त्व है तो चारित्र को कभी न कभी आना ही पड़ेगा। यह सम्यक्त्व का विशेष प्रभाव होता है कि इसके आ जाने के बाद चारित्र को आना ही होता है। ऊपरी तौर पर कहीं चारित्र हा गया तो सम्यक्त्व आए ही, ऐसा आवश्यक नहीं होता। सम्यक्त्व को इक्का माना जा सकता है। यह ऐसा इक्का है, जिसके आगे शून्य लगाने से उसमें और इजाफा हो सकता है। सम्यक्त्व होने से मोक्ष की प्राप्ति की उपलब्धि निश्चित होगी, ऐसा मानना चाहिए। सम्यक्त्व को अच्छा बनाए रखने के लिए जो सत्य है, निःकलंक है, जिसे जिनों द्वारा केवलियों द्वारा प्रवेदित है। आदमी को सत्य का अनुयायी बनने का प्रयास करना चाहिए।
सम्यक्त्व की मंदता के लिए आदमी को अपने कषायों को भी मंद करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी के जीवन में कषाय न आएं, ऐसा प्रयास भी होना चाहिए। क्रोध, मान माया और लोभ कषायों को पतला बनाने का प्रयास करना चाहिए। साधु दूसरों को संतोष देने वाला होता है। आदमी को मन, वचन और काया से क्षमा रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को सम्यक्त्व के संदर्भ में अनेक प्रेरणाएं प्रदान करते हुए कहा कि सम्यक्त्व की निर्मलता के लिए कषायों को मंद बनाए रखने का प्रयास होना चाहिए। आदमी का दृष्टिकोण सच्चाई के साथ जुड़ा रहे। आदमी को सच्चाई की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। सच्चाई के प्रति निष्ठा और श्रद्धा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुनि पारसकुमारजी ने 55 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री ने उन्हें तपस्या का प्रत्याख्यान कराया। इस प्रकार मुनि पारसकुमारजी ने 55 की तपस्या की लड़ी भी सम्पन्न कर ली। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया। मुनि विशालकुमारजी और साध्वी सिद्धांतश्रीजी ने आचार्यश्री से आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

