भारतीय सिनेमा में विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभा कर अलग पहचान बनाने वाले संजय सूरी अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘झलकी’ को लेकर चर्चा में हैं साथ ही उन्होंने यह फिल्म करने के बाद जो संतुष्टि व्यक्त की है वह उनके अच्छे अभिनेता होने के साथ ही एक अच्छे इंसान होने की भी गवाही देता है। संजय सूरी ने इंटरव्यू के दौरान कहा कि सिनेमा में कुछ अच्छा करने की मेरी आकांक्षा हमेशा रहती है। ‘कभी हां कभी ना’ फिल्म से बॉलीवुड में कदम रखने वाले संजय ने कैरियर की शुरुआत मॉडलिंग से की थी। वे बॉलीवुड में अब तक कई यादगार फिल्में दे चुके हैं तथा अभिनेता के साथ-साथ निर्माता एवं निर्देशक भी हैं।
पिछले दिनों रिलीज हुई ‘झलकी’ बेहद संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म है, जो काफी तारीफें बटोर रही है। इस फिल्म में संजय सूरी ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘झलकी’ की रिलीज से पहले उनसे फिल्म को लेकर बात हुई। इस दौरान उन्होंने सिर्फ फिल्म को लेकर ही नहीं बल्कि बचपन को लेकर भी काफी महत्वपूर्ण बातें बताईं। उनका कहना है कि बच्चों व उनकी समस्याओं पर सिर्फ कम फिल्में ही नहीं बन रहीं बल्कि उनका बचपन कहीं न कहीं छीना जा रहा है। उनका लोगों से सवाल है कि फिल्म को लेकर तो लोग पूछ रहे हैं कि बच्चों पर फिल्में कम क्यों बन रही हैं, इस पर हमारा कहना है कि बच्चों के लिए प्ले ग्राउंड क्यों कम हैं? कहीं ना कहीं हम बच्चों का स्पेस छीन रहे हैं। इस पर हम सभी को ध्यान देने की जरूरत है।
उल्लेखीय है कि फिल्म ‘झलकी’ नॉबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के जीवन से प्रेरित होकर एक ऐसी बच्ची की कहानी पर बनी है जो बाल मजदूरी कराने वाले ठेकेदारों के चंगुल में फंसे अपने भाई को छुड़ाने के लिए काफी संघर्ष करती है। तमाम दरवाजे खटखटाती है लेकिन वह अपने भाई को छुड़ाने में नाकाम रहती है बावजूद इसके वह हिम्मत नहीं हारती और तब तक लड़ती रहती है, जब तक वह उसे मुक्त नहीं करवा लेती। फिल्म बच्चों के बचपन को छीन रहे उस रैकेट का पर्दाफाश करती है, जो अपने कारोबार के लिए नौनिहालों से उनका बचपन छीन लेते हैं और उन्हें बाल मजदूरी के दलदल में फंसाकर उनकी जिंदगी तबाह कर देते हैं।
फिल्म में संजय सूरी ने कलेक्टर की भूमिका निभाई है, जो हमारे वर्तमान सिस्टम को बड़ी बरीकी से दिखाते हैं कि किस तरह एक कलेक्टर पूरे जिले के लिए काम करता है और सिस्टम के हाथों बंधा हुआ होता है। वे कहते हैं कि यह उसकी गलती नहीं है कि वह किसी मामले को लेकर गंभीर नहीं हो पाता बल्कि सिस्टम का जो चेन है, कहीं न कहीं वह उसे इतना व्यस्त रखता है कि वह किसी एक मामले पर ध्यान ही नहीं दे पाता, जिसकी वजह से जरूरी मुद्दा होने के बाद भी वह सिस्टम के साथ अपनी रफ्तार से चलते हुए उस पर फोकस नहीं कर पाता।
फिल्म को लेकर संजय सूरी कहते हैं कि ऐसी फिल्में जरूरी होने के बावजूद भी बॉलीवुड की चकाचौंध में कहीं खो जाती हैं। कई बार महंगाई का शिकार हो जाती हैं तो कई बार प्रमोशन नहीं हो पाता, जिसकी वजह से फिल्में लोगों तक पहुंचने में भी नाकाम रह जाती हैं। हालांकि बदलते समय में संशाधन बढ़े हैं। मोबाइल, यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफार्म लोगों तक इन्हें पहुंचा तो रहे हैं लेकिन कई मामलों में गवर्नमेंट की तरफ से ऐसी फिल्मों के लिए कोई ठोस नीति न हो पाना भी इन्हें लोगों तक पहुंचाने में हम नाकाम रह जाते हैं। जैसे हम फ्रांस की बात करें तो वहां हर फिल्म की टिकट का एक पर्सेंट फ्रेंच सिनेमा फंड में जाता है जो फ्रेंच प्रोड्यूसर को फिल्म बनाने में सहयोग करता है। अपने यहां भी आर्ट और कल्चर को बढ़ावा देने के लिए कुछ पर्सेंट इसके मद में लेकर समाज के लिए जरूरी सिनेमा को बढ़ावा देने हेतु दिया जाना चाहिए। ‘झलकी’ जैसी फिल्म से समाज को फायदा होगा, बाल मजदूरी को रोकने में मदद मिलेगी, लोगों में जागरूकता आएगी, इसलिए सरकार को इन चीजों पर ध्यान देना चाहिए।
संजय बताते हैं कि ऐसी फिल्मों से हमें कमाई भले ना हो लेकिन संतुष्टि मिलती है। इसलिए ऐसी फिल्में हम बनाते हैं। इस पर सरकार को भी गंभीर होने की आवश्यकता है। ऐसी फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए स्ट्रेटजी बनाने की भी जरूरत है। वे आगे कहते हैं कि मैं जो भी फिल्में करता हूं उसके लिए पहले कहानी देखता हूं, फिर रोल देखता हूं। मेरी बहुत आकांक्षाएं नहीं हैं बल्कि कोशिश रहती है कि कुछ अच्छा कर सकूं। झलकी रिलीज के बाद कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत होने के साथ ही देश में काफी वाह-वाही बटोर रही है। फिल्म में संजय सूरी के अलावा बोमन इरानी, गोविंद नामदेव, दिव्या दत्ता, आरती झा, गोरक्ष सकपाल ने मुख्य भूमिका निभाई है जबकि निर्देशन ब्रम्हानंद एस. सिंह ने किया है। लेखक ब्रम्हानंद एस. सिंह एवं तन्वी जैन हैं।
- दिनेश कुमार ([email protected])

