फाल्गुन माह में अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक भगवान विष्णु की विशेष रूप से पूजा करने की परंपरा है। होलाष्टक की इस अवधि में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक होता है, इसलिए इस अवधि में भजन, जप, तप अवश्य करना चाहिए। होलाष्टक के दिनों में मनुष्य को अधिक से अधिक समय साधना में व्यतीत करना चाहिए।
होलाष्टक से मौसम में बदलाव आना आरंभ हो जाता है। मान्यता है कि इन दिनों में शुरू किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं होता। ज्योतिष के अनुसार इन 8 दिनों में ग्रह अपना स्थान बदलते हैं। होलाष्टक के आठ दिनों में गर्भवती स्त्री को नदी-नाले पार कर यात्रा नहीं करनी चाहिए। इन दिनों में देवी-देवता की पूजा करना अनिवार्य हो जाता है। उपवास और दान करने से भी लाभ प्राप्त होता है। होलाष्टक में उत्पन्न हुई नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव समाप्त करने के लिए होलिका का निर्माण किया जाता है। कंडों से बनी होली का दहन करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि शरीर में कोई असाध्य रोग हो तो होलाष्टक के दौरान भगवान शिव का पूजन करें। परिवार की समृद्धि के लिए हनुमान चालीसा एवं विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। नवग्रह की कृपा प्राप्ति के लिए भगवान शिव का पंचामृत अभिषेक करें। होलाष्टक में पीले वस्त्र धारण करें। भगवान श्रीगणेश और भगवान विष्णु की आराधना करें। भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें। होलाष्टक शुरू होने वाले दिन होलिका दहन के स्थान का चुनाव किया जाता है। होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकड़ियां डाली जाती हैं।
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

