आदमी अतीत के पृष्ठो को पलटता है और भविष्य की कोरी कल्पनाओं में निमग्न हो जाता है, पर यथार्थ तो वर्तमान का कर्म पथिक बन सही मायने में सफर को सजगता से तय करता है। समय का पहिया तो निरंतर चलता रहता है। जीवन में कभी सुख तो कभी दुःख का अनुभव होता है। दुःख अच्छा नहीं लगता और सुख ऐसा है जो अधिक समय तक टिकता नहीं। जो व्यक्ति धैर्यता, सहनशीलता व मन्न की गहराई से समय के साथ चलता है वह अधिक समय तक सुख को बटोरने में सक्षम हो पाता है । रामचरित मानस में कहा गया है —
‘धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपततिकाल परखिए चारी।’
भगवान महावीर ने कहा है –
“समो निंदा प्रसाँसु तहा माणाव माणवो”
अर्थात मानवीयता उसी में है जो सुख – दुःख, जीवन- मरण और निंदा – प्रशंसा में समान रहे। यह तभी संभव है जब व्यक्ति धेर्यता व सहनशीलता मय जीवन पथ को पार करे ।
वर्तमान में कोरोना वायरस से पूरा विश्व संक्रमित है। इस संक्रमण काल में हर प्रकार की सीख हर प्रकार से दी जा रही है । सरकार द्वारा, सामाजिक संगठनों द्वारा, मीडिया द्वारा, मोबाईल द्वारा बार बार इस आपदा से बचने के लिए घर में रहें, मास्क लगाएं, हाथो को साबुन से धोएं, भीड़ से बचे, दूरी बनाए रखे एवं चिकित्सक की सलाह लें, क्योंकि इस बीमारी से बचना ही सबसे बड़ा उपाय है ।
इतना प्रचार – प्रसार होते हुए भी आदमी न जाने क्यों विचलित होता नजर आ रहा है । उसको लगता है मै जो कर रहा हूं वह ही सही है , इसका कारण है जब आदमी अपना चेहरा आइने में देखता है तो वास्तविकता से दूर यह भ्रम पाल लेता है कि मुझसे खूबसूरत इस दुनिया में कोई नहीं है।
लोकडाउन बढ़ने,ख़त्म होने एवं घटने का सिलसिला भी हमारे अपनी जीवन रक्षा के लियें इस बीमारी से बचने के लिए ही हैं। लोक़ डाउन की स्थिति में भविष्य की चिंता करना तो व्यावहारिक हे किंतु यह जीवन बचेगा तब तो ये चिंताए लाज़मी रहेगी एवं जायज़ ठहरेगी। पहले “ जान हैं तो जहान है, फिर माल और मकान है।”
अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें। गहराई से विचार करे। लोकडाउन की स्थिति को अपने स्वयं के बचाव के परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए लोकडाउन के समय व लोकडाउन खुलने के बाद, दोनो ही स्थितियों में स्वयं से साक्षात्कार अवश्य करें ! स्वयं का स्वयं के लिए ही निर्णय सही रहता हैं। अफ़वाहों से बचे, इससे कुछ नहीं होगा, इस बेफ़िक्री को छोड़े ! व्यर्थ , ज़बरन बाहर निकलने का दुस्साहस न करे। अतः अपेक्षित है स्वयं ही स्वयं को इस सीख से जोड़े। स्वयं के द्वारा उपजी हुई सीख ही इस बीमारी के द्वारा डुबने से बचा सकती है। पुरानी कहावत वास्तव में वर्तमान में प्रासंगिक है कि – “सुख शरिरा उपजे, दीदा लागे डाम।”
जीवन की प्रगति पंख की उड़ान के लिए आवश्यक हैं — स्वयं स्वयं को देखें , संयम पूर्वक चले, खाएँ एवं दैनिक गतिविधियों का संयमपूर्वक निर्वहन करे! स्वयं की चेतना का जागरण और तदनुरूप बचाव ही इस संकट की घड़ी से उबार सकता हैं ! अणुव्रत संकल्प शक्ति की स्वीकृति व उसमें निहित “ संयम खलु जीवनम” संयम ही जीवन हे, को अंगीकार कर स्वयं की सीख से स्वयं को सिखाने हेतु चरण बढ़ाए ! ख़ुद जिएँ और दूसरों को भी जीने हेतु मददगार बने।

