मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार के प्रांगण में आज रविवारीय शिबिर में पं. ललितशेखरविजयजी म. सा. ने “7 MONSTERS (7 शैतान)” विषय पर प्रवचन दिया।
7 व्यसनों (बुरी आदतों) को त्यागने वाला ही सच्चा जैन होता हैं। इसलोक और परलोक में सुखी होना हो तो आत्मा के ऊपर दमन, संस्कार और नियंत्रण लाना जरूरी हैं। जो 7 व्यसनों से भरा हुआ हैं वो मानव भी कहलाने के लायक नहीं हैं। आत्म दमन का पहला रास्ता तप और संयम हैं, इच्छाओं को दबाना तप कहलाता हैं और पांचों इंद्रियों पे नियंत्रण संयम कहलाता हैं। और दूसरा रास्ता बंधन।
1. मद्यपान यानी शराब, चरस, गांजा, भाग, अफीम, हेरोइन, सिगरेट, तंबाकू, आदि, शराब व्यसन सबसे खतरनाक हैं और इसके 16 दोष हैं। 2. मांसाहार यानी 22 प्रकार के कलयुग के अभक्ष्य, बेकरी के 5 (ब्रेड, पाव, चॉकोलेट, केक और बिस्किट), स्नैक्स के 5 (नूडल्स, कुरकुरे, पास्ता, मंचूरियन और चीज़ बॉल), डेयरी के 5 (बटर, चीज़, पनीर, श्रीखंड और क्रीम), फास्टफूड के 5 (पिज़्ज़ा, बर्गर, सैंडविच, पाव-भाजी और दाबेली), कोल्ड ड्रिंक और आइसक्रीम। 3. परस्त्रीगमन यानी दूसरी औरतों के साथ शारीरिक संबंध बनाना। 4. वैश्यागमन यानी वैश्याओं के साथ शारीरिक संबंध बनाना। 5. जुआ यानी शेर बाजार, पत्तेबाज़ी, सट्टेबाजी, आदि। 6. चोरी (अदत्त) यानी जो हमारी नहीं हैं वो वस्तु बिना इजाजत लेना। और 7. शिकार यानी शौक से कोई भी जीव की हत्या करना।
संयम और तप (पहला रास्ता) में इनका त्याग हो जाता हैं, पर हम चाहे इनमें से कोई व्यसन ना भी करते हो पर जबतक हम इनकी बाधा या नियम (दूसरा रास्ता) नहीं लेते तबतक इनका पाप लगते ही रहता हैं।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ताओं के अलावा सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही।
सात व्यसनों को त्यागने वाला सच्चा जैन होता हैः ललितशेखरविजयजी म. सा.

