क्या आपने कभी सोचा हैं कि हजारों साल पहले जब तकनीक शब्द भी पैदा नहीं हुआ था, तब भी लोग एक लोक से दूसरे लोक के देवताओं से “संपर्क” कैसे करते थे? क्या वह महज ध्यान और साधना का माध्यम था, या उसके पीछे कुछ और भी विज्ञान था, जिसे समय की धूल में दफन कर दिया गया?
क्या यह संभव नहीं कि जिन पत्थर की मूर्तियों को आज हम केवल पूजा का माध्यम मानते हैं, वे वास्तव में प्राचीन संचार यंत्र (Ancient Communication Devices) रहे हो? जैसे आज हम मोबाइल फ़ोन के ज़रिए सेटेलाइट से जुड़ते हैं, वैसे ही अतीत में ये पत्थर की मूर्तियाँ भी एक उच्च स्तर की “जैविक-ऊर्जा” (bio-resonance या cosmic frequency) के माध्यम से संपर्क स्थापित करने का कार्य करती थी?
तो फिर सवाल ये उठता हैं कि जब वो संपर्क टूट गया, जब वह तकनीक नष्ट हो गई, तो क्या पत्थर की उस मूर्ति को अब भी “जागृत” मानना तर्कसंगत हैं? या यह बस हमारी भावनाओं और परंपरा की विरासत बन गई, जिसे अंधश्रद्धा में लपेट कर हमने “भक्ति” की पॉलिश कर दी?
हर बार जब किसी गाँव की ज़मीन से कोई प्राचीन आकृति निकलती हैं, तो भीड़ उमड़ती हैं, भजन शुरू होते हैं और फिर वही घोषणा होती हैं – “प्राण प्रतिष्ठा” की जाएगी। प्रश्न यह हैं कि क्या भगवान सच में पत्थर में प्रवेश करते हैं, या हम ही अपने भीतर का भय, आस्था और लालच उस मूर्ति पर थोपते हैं ?
क्या आपको यह हास्यास्पद नहीं लगता कि जिस संचार यंत्र की वायरिंग और तकनीकी व्यवस्था नष्ट हो चुकी हैं, उसे हम “देवता” मानकर पूजने लगते हैं? और फिर वहीं से शुरू होता हैं पाखंड का व्यवसाय, जिसमें तथाकथित बाबा, गुरु, और साधु-संत प्रकट होकर मूर्ति में “प्राण फूंकने” का दावा करते हैं।
क्या यह मोबाइल में सिम कार्ड न होने पर कॉल करने की कोशिश जैसा नहीं हैं ? फोन तो हैं, लेकिन नेटवर्क नहीं ! और इस नेटवर्क के टूटते ही विज्ञान की जगह अंधविश्वास हावी हो गया। प्राकृतिक आपदाएं, जलप्रलय, भूकंप या खगोलीय घटनाएं जब अतीत में उन संचार माध्यमों को तहस-नहस कर गईं, तो वे “यंत्र” अपनी मूल उपयोगिता खो बैठे। लेकिन दुर्भाग्य से, उनके ऊपर श्रद्धा की एक परत चढ़ती चली गई और धीरे-धीरे धर्म के नाम पर एक नया बाज़ार खड़ा हो गया।
आज अगर कोई बच्चा मोबाइल फ़ोन को देखकर पूछे- “इसमें भगवान है?” तो शायद हम हँस पड़े। लेकिन जब वही पत्थर की मूर्ति किसी अज्ञात स्थल से मिलती हैं, तो हम उसे “चमत्कार” मान लेते हैं। क्यों? क्योंकि हमने तर्क से ज़्यादा भावनाओं को तरजीह दी हैं। क्या यह समय नहीं आ गया हैं कि हम मूर्तियों की पूजा के साथ-साथ उनके इतिहास, संरचना और उद्देश्य को भी समझे ? क्या यह ज़रूरी नहीं कि हम समाज को सिखाएं कि “भक्ति का मतलब आँख बंद करना नहीं होता, बल्कि सत्य की तलाश में आँखें खोलना होता हैं।”
विज्ञान, इतिहास और अध्यात्म – ये विरोधी नहीं, एक ही सिक्के के तीन पहलू हैं। लेकिन जब इनका संतुलन बिगड़ता हैं, तब समाज मूर्तिपूजा से आगे नहीं बढ़ पाता और पाखंड की दुकानें सज जाती हैं। तो अब निर्णय आपका हैं। आप उस “मूर्ति” के पीछे छिपे विज्ञान को जानना चाहेंगे या किसी पाखंडी के “प्राण फूंकने” के नाटक में आस्था लुटाते रहेंगे ? ”समय हैं सोच बदलने का, श्रद्धा को तर्क से जोड़ने का, और उस ‘देवता’ को भीतर खोजने का – जो बाहर के पत्थरों में नहीं, बल्कि आपके विवेक में छिपा हैं।”
संवाद: क्या सच में प्राण फूंकने से पत्थर भगवान बन जाते हैं ?

