मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार के प्रांगण में आज पं. ललितशेखरविजयजी म. सा. ने “पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण” के प्रथम दिन पर्युषण महापर्व के 5 कर्तव्यों के बारे में समझाया।
जिनशासन में बहुत सारे लोकोत्तर पर्व आते हैं, ओली तप प्रधान हैं, पर्युषण महापर्व को दर्शन पर्व, त्याग पर्व, चारित्र पर्व, दान पर्व, शील पर्व, ब्रह्मचर्य पर्व, तप पर्व, भाव पर्व, दया पर्व, आदि भी कहते हैं और इन सब को मिलाकर होता हैं श्रमण पर्व, तीर्थंकरों का श्रमण करना हैं। पशुओं में क्रूरता दिखती हैं, झडपने की वृत्ति होती हैं, जाती-वैर होता हैं, खाने की वृत्ति होती हैं और ध्येय और लक्ष्य के बिना का जीवन होता हैं और मनुष्य पशुओं से अति-उत्तम हैं जो इन सब के विरुद्ध वर्तन और प्रवर्तन कर सकता हैं।
पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के 5 कर्तव्य होते हैं, 1. अमारी प्रर्वतन यानी जन्मोजन्म की हिंसा और क्रूरता को खत्म करवाना, खुद करना यानी वर्तन और दूसरों से करवाना यानी प्रवर्तन। समस्त जीव राशि के प्रति प्रेम भाव लाना। पृथ्वीकाय के जीवों की हिंसा करे तो भूकंप आता हैं, अपकाय के जीवों की हिंसा करे तो सुनामी आती हैं, वायुकाय के जीवों की हिंसा करे तो आंधी-तूफान आते हैं, तेउकाय के जीवों की हिंसा करे तो अग्नि-काण्ड और दावानल होते हैं और वनस्पतिकाय के जीवों की हिंसा करे तो बीमारियाँ आती हैं। अगले भव में अगर सशक्त शरीर चाहिए तो इस भव में जीवदया का पालन करना चाहिए।
2. साधर्मीक भक्ति यानी सामान धर्मी की सहायता करना, सभी धर्म एक तरफ और साधर्मिक भक्ति एक तरफ फिर भी साधर्मिक भक्ति का पलड़ा भारी रहता हैं। संभवनाथ भगवान ने साधर्मिक भक्ति की और तीसरे भव में तीर्थंकर बने।
3. क्षमापना यानी परस्पर एक दूसरे से भूलों की माफी मांगना और माफ करना, क्षमापना भाव से कइयों को केवल ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी हैं।
4. अट्ठम तप यानी 3 दिन का उपवास, वर्ष मे एक बार नागकेतु की तरह आत्मा के कल्याण के लिए अट्ठम तप करना चाहिये।
5. चैत्य परिपाटी यानी वर्ष में एक बार नगर के प्रमुख जिनालयों में महोत्सव समेत वाजते-गाजते देव दर्शन के लिए जाना चाहिए। आवश्यक कर्तव्य के रूप में पर्युषण पर्व की पूर्णाहुति के पश्चात ये कर्तव्य निभाते हैं। ये पांचों कर्तव्यों का पालन प्रति वर्ष सभी को करना आवश्यक हैं।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार प्रवचन दौरान पर्युषण पर्व के प्रथम दिन सम्पूर्ण कार्यक्रम के लाभार्थी श्रीमती लेहरीबाई घमंडीरामजी मुथा (चितलवाना) का बहुमान किया गया और शाम को प्रतिक्रमण पश्चात धार्मिक संगीतमय हाऊजी का आयोजन किया गया जिसमें इनामों के साथ लकी ड्रा भी रखे गए। इन मौकों पर ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ताओं के अलावा सैकड़ों तपस्वियों और श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही।
पर्युषण का प्रथम दिन: सुणजो साजन संत, पजुसण आव्या रे

