खाद्य संयम दिवस व जयाचार्य महाप्रयाण दिवस मनाया
पालघर। महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनिश्री जिनेश कुमार जी ठाणा 2 के सान्निध्य में तेरापंथ भवन में पर्युषण पर्व पर नवाह्निक कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ सैकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं के मध्य हर्षोल्लास पूर्वक हुआ।
पर्यूषण पर्व का प्रथम दिन खाद्य संयम दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री जिनेश कुमार जी ने कहा जैन धर्म का महत्वपूर्ण पर्व पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व रुकने, झुकने व मुड़ने पर्व है। पर्युषण का अर्थ है चारों ओर से सिमटकर चेतना के समीप निवास करना है। जिस प्रकार पंछी शाम को नीड में लौट आता है उसी प्रकार पर्युषण में श्रावक को अपने घर आत्मा में लौट कर आना चाहिए। पर्युषण आत्मनिरीक्षण का आत्मावलोकन का पर्व है। यह पर्व नहीं महापर्व है क्योंकि यह आत्म विशुद्धि का उत्प्रेरक है। मुनिश्री जी ने खाद्य संयम दिवस पर कहा शरीर को स्वस्थ रखने का एक महत्वपूर्ण उपाय है खाद्य संयम। खाद्य संयम से मन की पवित्रता बढ़ती है व कर्म निर्जरा होती है। जैसा खाए अन्न वैसा होए मन उक्ति प्रसिद्ध है। आहार से व्यवहार का निर्माण होता है।आहार शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व शुद्धि से स्मृति बढ़ती है। पर्युषण पर्व के प्रथम दिन सभी को खाद्य संयम का अभ्यास करना चाहिए। तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य जयाचार्य महाप्रयाण दिवस पर संबोधित करते हुए मुनिश्री जिनेश कुमार जी ने कहा आचार्य श्री जितमल जी मेधावी, तीव्र बुद्धि व श्रेष्ठ प्रतिभा के धनी थे। वे विधिवेत्ता, तत्ववेत्ता, साहित्यकार, आगमों के ज्ञाता, सहज कवि व आचार्य भिक्षु के विचारों के भाष्यकार थे। वे अनुशासन प्रिय थे। उन्होंने अपने जीवन में साढे तीन लाख पद्य परिमाण साहित्य का निर्माण कर राजस्थानी भाषा के भंडार को समृद्ध किया। मुनिश्री जी ने भगवान महावीर जीवन दर्शन का वाचन करते हुए नवसार के बारे में विश्लेषण किया।
इस अवसर पर मुनिश्री परमानंद जी ने कहा पर्यूषण पर्व अध्यात्म का उज्जवल पर्व है। भगवान ऋषभ जीवन चरित्र का वाचन किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपवास के प्रत्याख्यान किये व अखंड नमस्कार महामंत्र का जप प्रारंभ किया। यह जानकारी दिनेश राठौड़ ने दी।
पालघर में पर्यूषण पर्व का भव्य शुभारंभ

