रोशनलाल बडाला/महामंत्री मेवाड़ संघ
वर्तमान समय में कई सामाजिक संगठन अपने अपने क्षेत्र में विभिन्न योजनाओं को लेकर आगे बढ़ रहे है।किसी भी योजना की सफलता के लिए कई विचारणीय विषय होते है ।सबका विवेचन करना सम्भव नहीं लेकिन संक्षिप्त में सब पर अल्प प्रकाश डाला जा सकता है।
नेतृत्व अहम् से दूर रहे: जब कोई प्रकल्प दान दाताओ पर आधारित है तो नेतृत्व को किस बात का अहम्। जो स्वयं के पैसे डाल कर धार्मिक , सामाजिक या जन उपयोगी योजनाएँ लाते है उन्हें भी सदगुरु भगवंत अहम् से दूर रहने की सलाह देते है क्योंकि वो भी पूर्व जन्मो का संचित पुण्य है जिसके परिणाम स्वरूप लक्ष्मी का योग मिला और सदगुरु ने मार्ग दिखाया और कार्य के होने में मात्र निमित्त है।कर्ताभाव अहम को जन्म देता है फलस्वरूप पुण्योपार्जन की जगह पाप की गठरी बँधती है।अगर किसी को किसी संस्था , संघ, समाज या योजना का नेतृत्व मिला वो उसका अधिकार कम ज़िम्मेदारी ज़्यादा है।
हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है: संघ , समाज या संस्था में कोई छोटा नहीं होता। नेतृत्व का प्रथम कर्तव्य सबकी सुनना है और जो सुना उस पर विचार करना चाहिए हो सकता है कि छोटे से छोटा व्यक्ति बड़े काम की सलाह दे सकता है।कोई ये सोचे कि मैं करूँ वही सही वो अपना जीवन बहुत बड़ी ग़लत फ़हमी में निकाल रहा है न वो अपने जीवन को अपितु संस्था की साख को भी बट्टा लगा रहा है।
पद की समय सीमा होती है: हर पदाधिकारी को पद की शपथ लेते समय ही पद की अवधि बाँध लेनी चाहिए। कई व्यक्ति इस प्रकार से पद के साथ लगाव कर लेते है जैसे जीवन भर सब कुछ उनके नेतृत्व में ही संस्था चलेगी।हर व्यक्ति रिपीट होने की झुगाड़ में संस्था की प्रगति को दाव पर लगा देता है।
क्रिकेट में एक झूमला बहुत फ़ेमस है लोग ये बोले कि कब सन्यास ले रहे हो उस से अच्छा ये होता कि लोग कहे कि आप क्यों सन्यास ले रहे हो ।(क्रिकेट में सन्यास का मतलब प्रतियोगिता में टीम का हिस्सा नहीं रहना है, खेलना बंद करना नहीं है।
वरिष्ठता एवं वरीयता कभी न भूले:
क्रमशः … !!!

