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ललितशेखरविजयजी म. सा. ने श्रावक के वार्षिक 11 में से 6 कर्तव्यों को समझाया

Last updated: August 28, 2019 6:29 pm
Surabhi Saloni
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3 Min Read
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मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार के प्रांगण में पं. ललितशेखरविजयजी म. सा. ने आज “पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण” के तृतीय दिन प्रवचन में वार्षिक 11 कर्तव्यों का विषय लिया और 6 कर्तव्यों के बारे में समझाया। जिनशासन के श्रावकों के लिए प्रतिदिन के 6 कर्तव्य और वार्षिक 11 कर्तव्य बताए गए हैं,
6. महा पूजा यानी प्रभु के गुणों की प्राप्ति के लिए प्रभु की आंगी करना, मंदिर को अंदर और बाहर से सजाना, गंभारा, रंगमंडप, आदि को सजाना।
7. श्रुत पूजा यानी श्रुत ज्ञान की पूजा करना, क्रिया करने वाला सिर्फ देश आराधक होता हैं पर ज्ञान की प्राप्ति करने वाला सर्व आराधक होता हैं। श्रुत ज्ञान निर्णायक हैं, प्रभु ने श्रुत ज्ञान का राज्यभिषेक किया हैं, प्रभु के जो वचन हैं वो श्रुत ज्ञान हैं। सिर्फ श्रुत ज्ञान का आदान प्रदान होता है बाकी के चारों (मति, अवधि, मनःपर्यव और केवल) ज्ञान मूक ज्ञान बताए हैं। पाप से बचने के लिए ज्ञानी बनना पड़ेगा।
8. रात्रि जागरण यानी रात के समय धर्म चिंतन, तत्व ज्ञान की बातें, महापुरुषों के गुणगान, प्रभु भक्ति, आदि करते हुए रात पसार करना। पापी का ज्यादा सोना अच्छा ताकि वो कम पाप करें और धर्मी का कम सोना अच्छा ताकि वो धर्म आराधना ज्यादा करें।
9. उद्यापन यानी उजमणा, बड़ी तपस्या के बाद तप की उजमणि के लिए दर्शन-ज्ञान-चारित्र के उपकरण सजा के रखने चाहिए, ये निर्दोष होते हैं इसलिए साधु-साध्वी को खपते हैं।
10. तीर्थ प्रभावना यानी शासन प्रभावना, शासन के लिए ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे जैनेतर या अजैन लोग जिनशासन प्रति आकर्षित हो और अहोभाव के साथ जिनशासन की अनुमोदना करे।
11. आलोचना यानी किये हुए पापों का प्रायश्चित करना और आत्मा की शुद्धि करना। पापों की आलोचना लेना बहुत जरूरी हैं उसके बिना आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता।
11 कर्तव्यों को सरल तरीके से याद रखने का उपाय, 3 पूजा (संघ, स्नात्र और महा), 2 भक्ति (साधर्मिक और श्रुत ज्ञान), तप (उद्यापन) और तीर्थ (यात्रा त्रिक), क्षय (आलोचना) और वृद्धि (देवद्रव्य), भावना (जागरण) और प्रभावना (तीर्थ)।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार प्रवचन दौरान कल्पसूत्र के चढ़ावें लिए गए। वहीं ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ताओं के अलावा सैकड़ों तपस्वियों और श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही।

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