जब कोई गहरी सोच वाला व्यक्ति अपना दर्द बयां करता है तब जाकर ‘किरकेट’ जैसी फिल्म बनती है। जी हां, आज यानि 18 अक्टूबर को रिलीज हुई क्रिकेटर, राजनेता और अब अभिनेता कीर्ति आजाद की फिल्म ‘किरकेट’ में बिहार के अपमान का दर्द और फिर बिहार के युवा प्रतिभाओं के पिछड़ने की वजहों को बड़ी ही बारीकी से बयां किया गया है। खास बात यह है कि फिल्म में बिहार के बंटवारे व झारखंड बनने के बाद राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिहार को अपमानित करने, उपेक्षित रखने के षडयंत्र और यहां व्याप्त जाति, धर्म की गहरी खाई ने किस तरह बिहार के आगे बढ़ने में बाधक बने, इसे बखूबी परदे पर उतारा गया है। फिल्म में इस अपमान को सम्मान दिलाने के प्रयासों के दौरान कीर्ति आजाद के संघर्षों को दिखाया गया है। एक बात तो तय है कि इस फिल्म को देखने के बाद बिहार के लोगों को कई चीजें सीखने, समझने को जरूर मिलेंगी, जो बिहार के विकास में आज भी बाधक हैं।
कहानीः फिल्म की कहानी की शुरुआत उस समय से होती है जब पूरे देश में क्रिकेट को लेकर काफी क्रेज है, लेकिन बिहार के पास देश के क्रिकेट बोर्ड की सदस्यता तक नहीं होती। यहां के युवा क्रिकेट खेलना तो चाहते हैं लेकिन प्रदेश उनका प्रतिनिधित्व करने में सक्षम नहीं है। क्रिकेट खेलने की चाह रखने वाले युवा तैयारी तो करते हैं लेकिन वे अपना जौहर दिखा पाने में असफल होकर अंत में छोटा मोटा क्रिकेट खेलकर सट्टेबाजी करते हैं, कोई पान की दुकान खोलते हैं या डिप्रेस्ड हो जाते हैं। एक दिन एक सभा के दौरान एक व्यक्ति कीर्ति आजाद के ऊपर बल्ला फेंकता है। जिसका बेटा क्रिकेट खेलने के सपने तो देखता है लेकिन उन्हें पता है कि कोई फायदा नहीं। कितना भी कोशिश कर ले इसमें कैरियर तो बन ही नहीं सकता है। यह सब देख व सोचकर कीर्ति आजाद बहुत दुखी होते हैं और निकल पड़ते हैं बिहार को क्रिकेट में सम्मान दिलाने के लिए। उन सभी युवाओं को तलाशते हैं, जिनका सपना तो क्रिकेट खेलना होता है लेकिन मौका ना मिलने पर मायूस होकर कुछ और करने को मजबूर हो जाते हैं। इस बीच झारखंड के नेताओं द्वारा कई बार उन्हें अपमान का घूंट भी पीना पड़ता है बावजूद इसकी परवाह किए बिना वे अपने इस काम में लगे रहते हैं। बिहार को क्रिकेट में किस तरह से सम्मान दिलाने की कोशिश करते हैं, उनके रास्ते में कितनी अड़चने आती हैं, और मायूस युवाओं में जोश भरने में कितना सफल होते हैं, जाति-धर्म के जाल में फंसे उन युवाओं को एकजुट करने में उन्हें कितनी कामयाबी मिलती है, यह सब जानने और समझने के लिए एक बार थिएटर जाकर इस फिल्म को जरूर देखें। मेरा मानना है कि यह फिल्म न तो बोर करेगी और ना ही रोमांच में कोई कमी आएगी। उल्टे बिहार और कीर्ति आजाद की उस पीड़ा को समझने की आप भी कोशिश जरूर करेंगे।
एक्टिंगः फिल्म में राजनेता कीर्ति आजाद ने खुद अपनी भूमिका निभाई है और एकदम नेचुरल भी लगे हैं। इनके अलावा मुख्य किरदारों में विशाल तिवारी जो बिहार क्रिकेट के कप्तान विशाल तिवारी की ही भूमिका में हैं। एकदम बिहारी युवा के किरदार को पूरी तरह जिया है। टीवी एंकर महिमा देवराज की भूमिका में सोनम छाबरा ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। काली मुंडा के किरदार में सोनू झा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। हाव, भाव, संवाद सबकुछ बढ़िया प्ले किया है। क्रिकेटर शहाबुद्दीन के रोल में देव सिंह, रवि बंपर्ज के किरदार में सैफुल्लाह रहमानी और प्रीतम गुहा के रोल में अजय उपाध्याय का किरदार यादगार है। यूपी से संबंध रखने वाले उजय उपाध्याय ने बंगाली किरदार को इतने बेहतरीन ढंग से किया है कि कोई अंदाजा ही नहीं लगा सकता कि यह कोई यूपी के व्यक्ति ने किया है। हाव-भाव, चलना, बात करना सबकुछ करते हुए अजय ने एक मंजे हुए अभिनेता होने का परिचय दिया है। बाकी किरदारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। खास बात यह है कि कास्टिंग बहुत ही बेहतरीन है। फिल्म का एक-एक किरदार चुन चुनकर लिया गया है, जो काफी प्रभावी बन पड़े हैं।
लेखन/निर्देशन/संवादः फिल्म की कहानी पूरी तरह से बिहार की क्रिकेट और कीर्ति आजाद के संघर्षों पर आधारित है। जो काफी दिलचस्प है। इसे कलमबद्ध किया है विशाल विजय कुमार ने। फिल्म का निर्देशन योगेंद्र सिंह ने किया है जो फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि को बेहतर ढंग से समझने व ऑडियंस को समझाने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं। लोकेशन, एक्शन और म्यूजिक देखकर कहीं भी बनावटीपन नहीं दिखेगा। कुल मिलाकर लेखन/निर्देशन भी बेहतर है। फिल्म के कई संवाद काफी यादगार बन पड़े हैं जैसे ‘जब 11 बिहारी इकट्ठा होंगे तो वहां स्पोर्ट्स टीम नहीं पॉलीटिकल पार्टी बनती है’। ऐसे तमाम डायलॉग हैं, जो आने वाले समय में बातचीत के दौरान इश्तेमाल हो सकते हैं। फिल्म में आयटम नंबर गानों का चयन काफी दिलचस्प व मजेदार है।
कुल मिलाकर फिल्म अच्छी बन पड़ी है। जिसे सिर्फ बिहारी ही नहीं जो बिहार व बिहार के दर्द को जानना, समझना चाहते हैं, वे एक बार थिएटर जाकर फिल्म को जरूर देखें।
सुरभि सलोनी की तरफ से फिल्म को 4 स्टार।
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- दिनेश कुमार dinesh@surabhisaloni.com

