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क्रांत‍िरथ पर सवार सुरेंद्र पांडेय ने थामी थी आजादी की पतवार (8 अप्रैल जन्मदिवस विशेष) 

Last updated: April 8, 2026 12:21 pm
Surabhi Saloni
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8 Min Read
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Highlights
  • डॉ. शाह आलम राना (महान क्रांतिकारी शहीद जफर अली के वंशज)

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का एक ऐसा सूरमा, जिनके जन्म के 25 वर्ष पूरे होने पर, उनके जन्मदिवस पर ही उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। हम बात कर रहे हैं क्रांतिकारी दल के सुयोग्य संगठनकर्ता और विचारक, क्रांतिकारी सुरेंद्र पांडेय की। सुरेंद्र पांडेय का जन्म 8 अप्रैल 1904, दिन शुक्रवार को कानपुर के सचेंडी ग्राम में हीरालाल पांडेय एवं शारदा पांडेय के पुत्र के रूप में हुआ था। पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में अध्ययन के दौरान ही आपने शिव वर्मा, सुरेश चंद्र भट्टाचार्य, जयदेव कपूर, बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष, विजय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिधर्मियों के साथ मिलकर ‘कानपुर जिमनास्टिक क्लब’ नामक युवाओं का संगठन स्थापित किया।
शालिग्राम शुक्ल, रामदुलारे त्रिवेदी, जयदेव कपूर, जागेश्वर त्रिवेदी, गया प्रसाद कटियार, रमेश चंद्र गुप्त, तथा अपने छोटे भाई वीरेंद्र पांडेय और अन्य साथियों के साथ वे क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। उनकी बहन सुशीला आजाद भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण जेल गईं-यह पूरे परिवार की राष्ट्रभक्ति का प्रमाण था। इसी दौरान उनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण बोहरा, जतिन दास, यशपाल आदि महान क्रांतिकारियों से हुआ। शस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कर समाजवादी गणराज्य की स्थापना के उद्देश्य से 8-9 सितंबर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में क्रांतिकारी साथियों की ऐतिहासिक बैठक आयोजित हुई।
इस बैठक में संयुक्त प्रांत से सुरेंद्र पांडेय, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, ब्रह्मदत्त मिश्र; बिहार से फणीन्द्रनाथ घोष एवं मनमोहन बनर्जी; राजस्थान से कुंदनलाल; तथा पंजाब से सरदार भगत सिंह और सुखदेव शामिल हुए। चंद्रशेखर आजाद इस बैठक में उपस्थित नहीं थे, परंतु उन्होंने साथियों के निर्णय को स्वीकार करने की बात कही थी। फलस्वरूप, उनकी अनुपस्थिति में ही भगत सिंह एवं साथियों ने आजाद को ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का कमांडर-इन-चीफ चुन लिया। इसके पश्चात सुरेंद्र पांडेय ने सरदार भगत सिंह, राजगुरु आदि क्रांतिकारियों के साथ बड़ौदा में रहकर गुजरात में संगठन का विस्तार किया। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया। इस घटना ने क्रांतिकारियों को भीतर तक झकझोर दिया। फिरोजपुर के तूड़ी बाजार, मोहल्ला शाहगंज की एक इमारत में डॉ. बी.एस. निगम के नाम से चल रहे दवाखाने में क्रांतिकारी संगठन का गुप्त कार्यालय संचालित हो रहा था। यहीं प्रतिशोध की योजना बनी। 17 दिसंबर 1928 को पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को मारने की योजना बनाई गई, लेकिन भूलवश एएसपी जॉन सांडर्स मारा गया।
इसी बीच तत्कालीन वायसराय ने घोषणा की कि यदि सेंट्रल असेंबली ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ और ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पारित नहीं करेगी, तो उन्हें अध्यादेश के रूप में लागू किया जाएगा। इस परिस्थिति में आगरा स्थित पार्टी कार्यालय से भगत सिंह और उनके साथी दिल्ली पहुंचे और सेंट्रल असेंबली की कई दिनों तक रेकी की। 3 अप्रैल 1929 को दरियागंज स्थित डिलाइट सिनेमा के पास श्यामलाल फोटोग्राफर से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अपनी तस्वीर खिंचवाई। 8 अप्रैल 1929, दिन सोमवार को जयदेव कपूर ने असेंबली में प्रवेश के लिए पास की व्यवस्था की। प्रवेश के पश्चात पासों को जला दिया गया। भगत सिंह ने अपनी घड़ी और जूते पहले ही जयदेव कपूर को सौंप दिए थे। जैसे ही ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ पर मतदान के परिणाम की घोषणा होने वाली थी, उसी क्षण “बहरों को सुनाने के लिए” भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम विस्फोट किया। पूरा सेंट्रल हॉल धुएं से भर गया और गुलाबी पर्चों की वर्षा होने लगी। इस अफरा-तफरी में वे भाग सकते थे, किंतु पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार “इंकलाब जिंदाबाद” के नारों के साथ उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार कराया।
सुरेंद्र पांडेय ने अपने सेनापति चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। उस समय आजाद महत्वपूर्ण निर्णयों में उनसे परामर्श लेते थे और उन पर विशेष विश्वास करते थे। झांसी से कानपुर लौटते ही सुरेंद्र पांडेय को लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर की बोर्स्टल जेल में भगत सिंह एवं अन्य साथियों के साथ रखा गया। इस मुकदमे के दौरान राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए चले 63 दिन के ऐतिहासिक अनशन में यतीन्द्रनाथ दास शहीद हो गए। इस अनशन में सुरेंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनशन की खबर सुनकर उनकी पत्नी ने भी अन्न-जल त्याग दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी असामयिक मृत्यु हो गई-यह त्याग और समर्पण की चरम परिणति थी। 7 अक्टूबर 1930 को इस ऐतिहासिक मुकदमे का निर्णय सुनाया गया, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गई। विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, महावीर सिंह, किशोरी लाल, डॉ. गया प्रसाद आदि को लंबी सजाएं दी गईं। इससे पूर्व, 28 मई 1930 को रावी तट पर बम परीक्षण के दौरान भगवतीचरण वोहरा शहीद हो चुके थे।
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुछ सदस्यों की गद्दारी के कारण संगठन के गुप्त ठिकानों और सदस्यों की जानकारी पुलिस तक पहुंच गई। इस आंतरिक विघटन के चलते 4 सितंबर 1930 को दिल्ली के झंडेवालान में बैठक कर चंद्रशेखर आजाद ने सेंट्रल कमेटी को भंग कर दिया। लाहौर जेल से रिहा होने के बाद सुरेंद्र पांडेय, यशपाल और विश्वनाथ वैशम्पायन को क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने हेतु रूस भेजने की योजना बनाई गई, परंतु वैशम्पायन 11 फरवरी 1931 को कानपुर में गिरफ्तार हो गए। 27 फरवरी 1931 की सुबह, जब आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुरेंद्र पांडेय सहित और साथियों से मिल रहे थे, तभी ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया। लगभग बीस मिनट तक वीरतापूर्वक संघर्ष करने के बाद उन्होंने वीरगति प्राप्त की। आजाद की शहादत के बाद सुरेंद्र पांडेय ने दिल्ली में पुनः क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक आयोजित कर संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, किंतु उन्हें ‘द्वितीय दिल्ली षड्यंत्र केस’ में पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद विभिन्न मुकदमों में उन्हें कानपुर, फतेहगढ़, देवली आदि जेलों में 14 वर्षों से अधिक समय तक कैद रखा गया। रिहाई के बाद उन्होंने ‘दैनिक विश्वमित्र’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में पत्रकारिता की। स्वतंत्र भारत में उन्होंने योग एवं वैदिक संस्कृत के अध्ययन और प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया तथा अनेक यूरोपीय देशों में जाकर भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रसार किया। 13 जून 1992 को 88 वर्ष की आयु में ब्रेन हेमरेज के कारण इस महान क्रांतिकारी ने इस संसार को अलविदा कहा।

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