आदित्य तिक्कू।।
कुछ समय से मुझे प्रतीत होने लगा है कि हम गलतफहमी का शिकार होते जा रहे हैं। हमे इस सृष्टि का ही नहीं सम्पूर्ण ब्रम्हांड का ज्ञान है और हर विषय पर अपना ज्ञान प्रवचन देना हमारा मूलाधिकार हो गया है। यदि किसी विषय पर कह दिया ‘जी नहीं जानता’ तो उसी समय आपकी आज़ादी छिन्न-भिन्न हो जायेगी। आप मूर्खों की श्रेणी में आ जाएंगे। आपका अस्तित्व खतरे में होगा। यह भी भय उत्पन होने लगता है कि यदि हम मौन रहे तो आने वाली पीढ़ियां हमें कदापि माफ़ नहीं करेगी कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ष्ठ कृति होने के बाद भी हमें इतना भी नहीं पता। इसी भय से हम हर विषय पर प्रत्येक क्षण विचार व्यक्त करते रहते हैं। चाहे उस विषय का क- ख भी नहीं पता हो। आज कल मुझ जैसे लोग किसान कर माफ़ी के विरोध में है। क्यों? नहीं हम है, पर क्यों? यह गलत है। हमारे पैसो से देश चलता है, हम क्यों कर माफ़ करने का समर्थन करें। ज्ञानवेश्वरों से पूछा जाये, क्या आपको पता है कि बैंकों को फिर से 410 अरब रुपये दिए जा रहे हैं? आदरणीय वित्त मंत्री जेटलीजी ने संसद से इसके लिए अनुमति मांगी है। यही नहीं सरकार ने बैंकों को देने के लिए बजट में 650 अरब का प्रावधान रखा था। बैंकों की भाषा में इसे कैपिटल इन्फ्लो कहा जाता है। सरकार बैंकों को एक साल में 1 लाख करोड़ रुपये क्यों देना चाहती है? आप किसी भी विश्लेषण को पढ़िए, यही जवाब मिलेगा कि बैंकों ने पहले जो लोन दिए थे वो चुकता नहीं किए गए, फिर से लोन देने के लिए पैसे नहीं हैं। इसलिए सरकार अपनी तरफ से बैंकों को पैसे दे रही है ताकि बाज़ार में लोन के लिए पैसे उपलब्ध हो सकें। किसने लोन लेकर नहीं चुकाए हैं और किसे नया लोन देना है, इन दो सवालों के जवाब से सबकुछ साफ हो जाएगा। क्या यह कैपिटल इंफ्लो के नाम पर कर्ज़ माफ़ी नहीं है? सोचिये विरोध करने में मज़ा आएगा।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने 11 सरकारी बैंकों को प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डाल दिया था। इन सभी से कहा गया था कि वे एनपीए खातों की पहचान करें, लोन को वसूलें, जो लोन न दे उस कंपनी को बेच दें और नया लोन देना बंद कर दें। बैंकों का एनपीए जब खास सीमा से ज़्यादा हो गया तब यह रोक लगाई गई, क्योंकि बैंक डूब सकते थे। अब हंगामा हुआ कि जब बैंक लोन नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुक जाएगी। जरा सोचिये ये उद्योगपति सरकारी बैंकों से ही क्यों लोन मांग रहे हैं? प्राइवेट से क्यों नहीं लेते? प्राइवेट की तो सर्विस भी अच्छी है, ऐसा कहा जाता है वास्तविकता एकदम विपरीत है।
उद्योगपतियो के लिए सरकार सरकारी बैंकों में एक लाख करोड़ रुपये क्यों डाल रही है? किसान का लोन माफ करने पर कहा जाता है कि फिर कोई लोन नहीं चुकाएगा। यही बात इन उद्योगपतियों से क्यों नहीं कही जाती है? सितंबर 2018 में बैंकों का नॉन परफार्मिंग असेट 8 लाख 69 हज़ार करोड़ का हो गया है। जून 2018 की तुलना में कुछ घटा है क्योंकि तब एनपीए 8 लाख 74 हज़ार करोड़ था। लेकिन सितंबर 2017 में बैंकों का एनपीए 7 लाख 34 हज़ार करोड़ था। बैंकों का ज़्यादातर एनपीए इन्हीं उद्योगपतियों के लोन न चुकाने के कारण होता है।
सरकार बैंकों को 1986 से पैसे देती रही है, लेकिन उसके बाद भी बैंक कभी पूंजी संकट से बाहर नहीं आ सके। 1986 से 2017 के बीच एक लाख करोड़ रुपये बैंकों में दिए गए हैं। 11 साल में एक लाख करोड़ से अधिक की राशि दी जाती है। अब इतनी ही राशि एक साल के भीतर बैंकों को दी जाएगी। बिजनेस स्टैंडर्ड के एक लेख में देबाशीष बसु ने लिखा था कि यह सीधा-सीधा दान था। इसका बैंकों के प्रदर्शन में सुधार से कोई लेना-देना नहीं था। दस लाख करोड़ का एनपीए हो गया, इसके लिए न तो कोई नेता दोषी ठहराया गया और न बैंक के शीर्ष अधिकारी। नेता हमेशा चाहते हैं कि बैंकों के पास पैसे रहें ताकि दबाव डालकर अपने चहेतों को लोन दिलवाया जा सके, जो कभी वापस ही न हो।
यूपी चुनाव में किसानों की कर्ज़माफ़ी के वादे के बाद से अब तक सात राज्यों में करीब पौने दो लाख करोड़ से अधिक कर्ज़माफ़ी का एलान हो चुका है। लेकिन महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब और कर्नाटक में 40 प्रतिशत किसानों का ही लोन माफ हुआ है। दो राज्य बीजेपी के हैं और दो कांग्रेस के। उत्तर प्रदेश में लघु और सीमांत किसानों के एक लाख तक के कर्ज़ माफ होने थे। अप्रैल 2017 में फैसले का एलान हो गया। दावा किया गया था कि 86 लाख किसानों को लाभ होगा। इस पर 364 अरब रुपये ख़र्च होंगे। लेकिन 21 महीने बीत जाने के बाद मात्र 44 लाख किसानों की ही कर्ज़ माफी हुई है। यही नहीं कर्ज़ माफ़ी के बाद से इन चार राज्यों में खेती पर दिया जाने वाला कर्ज़ भी कम हो जाता है।
मेरे जैसे लोगों को विरोध से पहले विषय के बेसिक पॉइंट्स समझने के लिए अलग-अलग और कई प्रकार के सोर्स का सहारा लेना चाहिए तभी समझ आएगा कि दस लाख करोड़ का लोन नहीं चुकाने वाले मुट्ठी भर लोग मौज कर रहे हैं। उन्हें और लोन मिले इसके लिए सरकार 1 लाख करोड़ सरकारी बैंकों को दे रही है। किसानों के लोन माफ़ होते हैं, कभी पूरे नहीं होते हैं, होते भी हैं तो उन्हें कर्ज़ मिलने से रोका जाने लगता है। उद्योगपतियों को लोन देने में दिक्कत नहीं है, दिक्कत है लोन नहीं चुकाने और उसके बाद भी नया लोन देने के लिए सरकारों के उतावलेपने से। फिर क्यों किसानों की बात आती है तो हम लतीफ़े बनाने लगते हैं। व्हाट्सप्प-व्हाट्सप्प खेलने लगते हैं। हमें सैलरी मिलती है फिर भी अपनी ख्वाहिशों के लिए दोस्तों रिश्तेदारों या बैंकों से कर्ज लेते रहते हैं। सर्वसुविधा के पश्चात हमें कर्ज लेना पड़ता है। सोचिये 70 वर्षों से भूखा रह कर हमारा पेट भर रहे किसान के साथ ऐसा व्यवहार अनुचित से अधिक पाप है कि नहीं?
किसानों की कर्जमाफी पर सवाल, उद्योगपतियों पर चुप्पी…!

