लाडनूं। तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के विशाल एवं सुरम्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह वर्ष अपनी पूर्णता की ओर बढ़ता जा रहा है।
करीब आठ महीनों से अधिक समय का महामंगल प्रवास सुसम्पन्न हो चुका है। ऐसा सौभाग्य प्राप्त कर लाडनूंवासी निहाल हैं। अपने आराध्य की निकट सन्निधि, सेवा, उपासना का सुदीर्घ अवसर प्राप्त हो रहा है। इतना ही नहीं, 450 से अधिक चारित्रात्माओं के दर्शन आदि का सुअवसर भी उनके जीवन का मानों दुर्लभ प्रसंग बना हुआ है।
वहीं इस प्रवास के दौरान तेरापंथ धर्मसंघ के सभी संघीय व धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ तेरापंथ समाज की सभी संस्थाओं की संगोष्ठियां, वार्षिक सम्मेलन आदि-आदि अनेकानेक कार्यक्रम भी आयोजित हो चुके हैं और अनेकानेक आयोजन होने अभी शेष हैं। इनके माध्यम से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर आचार्यश्री के दर्शन, मंगलवाणी के श्रवण आदि के माध्यम से लाभान्वित हो चुके हैं।
रविवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘काय समाधारणा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आगम में प्रश्न किया गया है कि भंते! काय समाधारणा से जीव क्या प्राप्त करता है? शरीर को संयम साधना में नियोजित कर देने से क्या लाभ होता है?
संयम की साधना में किस प्रकार शरीर को लगाया जा सकता है। वर्तमान साधु की साधना में पांच महाव्रत अंगभूत हैं-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। छठा व्रत के रूप में सर्व रात्रि भोजन विरमण। अहिंसा महाव्रत में सर्व प्राणातिपात का विरमण होता है, लेकिन कुछ अंशों में साधुओं के लिए हिंसा असंगत भी नहीं होती। साधु विहार कर रहा है और उसे नदी पार करना होता है तो वहां क्या वहां जीव की हिंसा से बचा जा सकता है? कहीं काई आदि का संस्पर्श भी हो सकता है। चलने-फिरने, आदि-आदि अनेक कार्यों में कुछ अंशों में जीव हिंसा तो सकती है। साधु कपड़े, पुस्तक, लिखने की सामग्री, भोजन आदि के पात्र आदि का संग्रहण भी करना होता है। ये सब कुछ भी परिग्रह ही होते हैं ना, किन्तु ये साधु के लिए उपयोगी होते हैं। उन्हें रखना आवश्यक होता है। उपयोग आने वाली वस्तुओं को भी कुछ अंशों के अलावा नहीं रखना चाहिए।
सत्य, अचौर्य और अपरिग्रह का तो पूर्णतया पालन करना अनिवार्य है। साधु के लिए झूठ नहीं बोलना, यह अनिवार्य बात होती है। किसी प्रकार की चोरी नहीं करना, यह भी बहुत अनिवार्य है। सूर्यास्त के बाद साधु को भोजन क्या, पानी भी नहीं पीना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन भी अनिवार्य होता है। यह सभी संयम की बात भी होती है। चलते समय बात नहीं करना, ईर्या समिति में शरीर को नियोजित रखना कितनी अच्छी बात हो सकती है। प्रतिक्रमण में भी शरीर का नियोजन करते हुए खड़े-खड़े प्रतिक्रमण करने का प्रयास करना चाहिए। पंच पदों की वंदना की उठ-बैठकर करना भी शरीर का अच्छा नियोजन है। सेवा में भी शरीर का अच्छा नियोजन किया जा सकता है। इस प्रकार बताया गया कि काय समाधारणा से चारित्र पर्यवों का विशोधन हो सकता है। आज साध्वीप्रमुखाजी का भी चारित्र ग्रहण दिवस है। आज से 34 वर्ष पूर्व लाडनूं के इसी सुधर्मा सभा में आपकी दीक्षा हुई थी। आज तो कितने ही साध्वीजी, मुनिजी और समणी आदि का दीक्षा दिवस है। जीवन में सम्यक्त्व और चारित्र मिल जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। आज के दिन दीक्षा पर्याय सबसे लम्बा शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी का है, यह दीक्षा पर्याय और लम्बा होता रहे। सभी का चारित्र खूब लम्बा हो। साध्वीप्रमुखाजी साध्वी समुदाय की मुखिया हैं। आपका स्वास्थ्य खूब अच्छा रहे, अच्छा कार्य चलता रहे।
काय समाधारणा से चारित्र पर्यवों का होता है विशोधन : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
Highlights
- साध्वीप्रमुखाजी सहित अनेक साधु, साध्वियों व समणीवृंद को दीक्षा दिवस के संदर्भ में युगप्रधान अनुशास्ता से प्राप्त हुआ मंगल आशीर्वाद

