कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने श्रावण शुक्ला पूर्णिमा ‘रक्षाबन्धन’ के अवसर पर ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित जनता को ‘आयारो’ आगम के पांचवें अध्ययन के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में हिंसा भी चलती है। जहां राग-द्वेष होता है, वहां हिंसा की संभावना बन जाती है। आदमी हत्या, हिंसा में इसलिए जाता है कि उसकी पृष्ठभूमि में राग-द्वेष कारण होते हैं।
आदमी अर्थ, काम, संप्रदाय व सत्ता पाने के लिए हिंसा में प्रवृत्त हो सकता है।धन के प्रति लोभ है, लालसा है तो आदमी धन पाने के लिए हिंसा कर सकता है। कभी सांप्रदायिक उन्माद में भी हिंसा हो सकता है। काम की भावना और सत्ता पाने के लिए भी हिंसा हो सकती है। संसारी लोगों में कामनाएं बहुत होती हैं तो हिंसा भी बहुत अधिक हो सकती है। कामना, लालसा की प्रगाढ़ता हिंसा का बहुत बड़ा कारण है। आदमी के भीतर अपरिग्रह की चेतना का जागरण हो जाए तो आदमी हिंसा में जा ही नहीं सकता। अपरिग्रह भी बड़ा महान धर्म है। जहां परिग्रह से पकड़, मूर्छा, आसक्ति वहां हिंसा होती है। इसलिए अहिंसा को चेतना को पुष्ट करने के लिए आदमी को अपनी कामनाओं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करना चाहिए।
मूर्छा को शास्त्र में परिग्रह कहा गया है। परिग्रह के भी दो प्रकार बताए गए हैं-द्रव्य परिग्रह और भाव परिग्रह। पदार्थों को द्रव्य परिग्रह तथा आसक्ति, मोह, मूर्छा को भाव परिग्रह कहा गया है। पदार्थ कर्म का बंध नहीं करा सकते। कर्मों का बंध तो आसक्ति व मोह ही करा सकती है। भीतर में आसक्ति का भाव, पदार्थों में मोह हो जाने के कारण आदमी के भीतर विकृति आती है। साधु के पास धर्मोपकरण होते हैं। प्रमार्जनी, रजोहरण, मुखवस्त्रिका आदि होते हैं। इन पदार्थों के होते हुए भी साधु को कर्म का बंध नहीं करा सकते, क्योंकि साधु उन पदार्थों के प्रति आसक्त नहीं होता। दुनिया में बहुत पदार्थ होते हुए भी जिस आदमी के भीतर परिग्रह का भार नहीं होता, वह अहिंसक चेतना से परिपुष्ट हो सकता है। आदमी को ऐसा प्रयास करना चाहिए कि जितना संभव हो अपनी कामनाओं पर अंकुश लगाने का प्रयास हो। पास में जो परिग्रह हो, उसे भी चिंतनपूर्वक धीरे-धीरे कम करने और कभी छोड़ने का भी प्रयास हो ताकि आत्मा हल्की हो सके।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने जनता को ‘तेरापंथ प्रबोध’ के आख्यान से लाभान्वित किया। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्याजी ने जनता को उत्प्रेरित किया। उपासक व मुमुक्षु श्री हनुमान दूगड़ ने अपनी भावनाओं के द्वारा गुरुचरणों में अर्ज लगाई तो आचार्यश्री ने मुमुक्षु की अर्जी पर विशेष कृपा बरसाते हुए कहा कि प्रेक्षा विश्व भारती में आगे दीक्षा समारोह, कार्ति शुक्ला पंचमी, 26 अक्टूबर 2025 (रविवार) को श्री हनुमानजी दूगड़ को मुनि दीक्षा देने का भाव है। आचार्यश्री की इस कृपा से मुमुक्षु श्री हनुमानजी ही नहीं, उनके परिजन व पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष कर उठा।
कामनाओं पर लगे अंकुश तो अहिंसा की चेतना होगी पुष्ट : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
Highlights
- तेरापंथ प्रबोध के आख्यानमाला का श्रवण कर निहाल हुए श्रद्धालु
- मुमुक्षु हनुमानजी बरसी गुरुकृपा, 26 अक्टूबर को मुनि दीक्षा देने की हुई घोषणा

