मनोज कुमार सिन्हा।।
भारतीय वायु सेना के जांबाज पायलट अभिनंदन वद्र्धमान की रिहाई की कोशिशें आखिरकार सफल हुईं। आज उन्हें भारत भेजा जा रहा है। गुरुवार देर शाम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस बाबत अपनी संसद में एलान किया। अभिनंदन की सुरक्षित रिहाई के लिए भारत कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ उन तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का सहारा ले रहा था, जो युद्ध में मानवता की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। जिनेवा संधि का पालन करवाना उसी का एक हिस्सा था। यह समझौता असल में, दो राष्ट्रों के बीच होने वाले संघर्ष पर लागू है। इसमें युद्धरत सैनिकों की सुरक्षा की बात कही गई है। जिनेवा संधि में कुल चार संधियां शामिल हैं- जिनेवा संधि-एक, दो, तीन और चार। पहली संधि जमीनी जंग में शामिल सैनिकों की रक्षा की बात कहती है, तो दूसरी, समुद्र में होने वाले युद्ध में शामिल सैनिकों की। तीसरी जिनेवा संधि, युद्धबंदियों से जुड़ी है, तो चौथी, युद्ध के समय ‘सिविलियन पर्संस’ यानी आम नागरिकों की सुरक्षा की वकालत करती है। अहम बात यह भी है कि यदि युद्ध की स्थिति न हो और हिरासत में लिया गया व्यक्ति सुरक्षा बल का जवान हो, तब भी उसे जिनेवा संधि के तहत सभी तरह की रियायतें और सुविधाएं मिलती हैं।
जिनेवा कन्वेशन इसलिए बनाया गया है, ताकि सुरक्षा बलों को युद्ध के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके। जंग के दौरान जैसे ही कोई सैनिक घायल होता है और आत्मसमर्पण करता है, तो इस संधि के मुताबिक यह दुश्मन सैनिकों का कर्तव्य है कि वे उस घायल जवान के अधिकारों की पूरी रक्षा करें। घायल को न सिर्फ चिकित्सकीय सुविधा मुहैया कराई जाएगी, बल्कि उसके मानवाधिकारों का भी पूरा ख्याल रखा जाएगा। अभिनंदन के मामले में जिनेवा संधि-तीन हमारे लिए सबसे अहम औजार साबित हुई। खास बात यह भी है कि इस संधि के तमाम प्रावधान ‘कस्टमरी इंटरनेशनल लॉ’ बना दिए गए हैं, जिसका मतलब है कि कोई देश इस संधि का हिस्सा है अथवा नहीं, पर उसे यह मानना ही होगा। यानी, जिनेवा संधि के प्रावधान दुनिया के सभी देशों के लिए बाध्यकारी हैं।
जिनेवा संधि- तीन की धारा-4 में युद्धबंदियों की परिभाषा और उनके अधिकारों का जिक्र है। इसमें विस्तार से यह बताया गया है कि युद्धबंदियों को किस तरह की बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। इतना ही नहीं, इसमें यह भी तय किया गया है कि पकड़े गए सैनिक के पद और पदनाम का पूरा सम्मान रखा जाना चाहिए। इसके तहत युद्धबंदी को इसके लिए भी बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह अपने देश की खुफिया सूचनाएं जाहिर करे। इसकी धारा-13 युद्धबंदी के साथ मानवीय व्यवहार की वकालत करती है, और वह भी उसके ‘स्टेटस’ के बिना। ‘स्टेटस’ का मतलब उसकी पहचान से है कि वह वाकई सुरक्षा बल का जवान है या नहीं? अगर अभिनंदन सिविल ड्रेस में होते या उनके पास बैच नंबर आदि नहीं पाए जाते, तो संभव है कि पहचान न कर पाने का बहाना पाकिस्तान बनाता और उसकी सुरक्षित रिहाई के लिए तमाम नखरे दिखाता। लेकिन यहां ऐसी कोई स्थिति नहीं थी। अभिनंदन के पास ऐसे तमाम पहचान थे, जो उन्हें सुरक्षा बल के जवान घोषित कर रहे थे।
हालांकि, जिनेवा संधि ही नहीं, मानवाधिकारों को लेकर हुई सभी अंतरराष्ट्रीय संधियों में भी यह जिक्र किया गया है कि हर शख्स के बुनियादी अधिकारों का हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए, फिर चाहे वह अपना नागरिक हो या किसी दूसरे देश का। यही वजह है कि अपने यहां हम यह देखते हैं कि अपराधियों को भी कई तरह के अधिकार मुहैया कराए जाते हैं। उन्हें न सिर्फ कानूनी सहायता दी जाती है, बल्कि उनके बुनियादी अधिकारों का भी सम्मान किया जाता है। लिहाजा, यदि पाकिस्तान हमारे पायलट को नुकसान पहुंचाने की कोई कोशिश करता या उसे सौंपने में ना-नुकुर करता, तो जिनेवा सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के उल्लंघन का वह दोषी हो सकता था, और यह स्थिति किसी भी देश के लिए अच्छी नहीं मानी जाती।
ऐसे में, माना तो यही जा रहा था कि अभिनंदन को वे तमाम सुविधाएं मिल रही होंगी, जिनका जिक्र इन संधियों, खासकर जिनेवा संधि-तीन में है। मगर यह सवाल कहीं ज्यादा अहम था कि वह भारत लौटेंगे कब? चूंकि भारत और पाकिस्तान किसी घोषित युद्ध में शामिल नहीं हैं, और अभिनंदन भारतीय सीमा में दाखिल होने की कोशिश कर रहे पाकिस्तानी विमानों को खदेड़ने के चक्कर में नियंत्रण रेखा पार कर गए थे, इसलिए कायदे से पाकिस्तान को उन्हें तुरंत सौंप देना चाहिए था। हालांकि जिनेवा संधि यही कहती है कि यदि घोषित युद्ध में देश उलझे हों, तो युद्ध-समाप्ति के बाद या किसी समझौते की सूरत में सभी ‘युद्धबंदियों’ को रिहा कर देना चाहिए।
बहरहाल, दबाव में ही सही, पाकिस्तान ने हमारे पायलट को रिहा करने का फैसला लिया है, जो हमारे लिए सुकूनदायक है। यह कदम आपसी तनाव घटाने में कारगर हो सकता है। यदि पाकिस्तान और देरी करता, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता था, क्योंकि ऐसी स्थिति में कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव ही ऐसे हथियार होते हैं, जिनकी सहायता से किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय संधियों के पालन का दबाव बनाया जा सकता है। हमारे पास एक अन्य विकल्प अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी जाने का होता, जहां अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के उल्लंघन के लिए पाकिस्तान को घेरा जा सकता था। दरअसल, किसी भी देश का यह कर्तव्य है कि अगर वह अंतरराष्ट्रीय संधि का हिस्सा है, तो उसके प्रावधानों का सम्मान करे। ऐसा न करने पर उस पर कई तरह के राजनयिक प्रतिबंध आयद हो सकते हैं। संभवत: इसी तरह के दबाव बढ़ने की आशंका ने ही पाकिस्तान को मजबूर किया होगा कि वह अभिनंदन को ससम्मान और सुरक्षित रिहा करे।(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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