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जलवायु परिवर्तन के खतरे से तुरंत निपटने का आह्वान, पोलैंड में 200 देशों के प्रतिनिधि जुटे

Last updated: December 3, 2018 6:40 am
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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कातोवित्स:पोलैंड के कातोवित्स में 2015 के पेरिस समझौते के बाद जलवायु परिवर्तन पर सबसे अहम बैठक रविवार को शुरू हो गई।  इस दौरान 200 देशों के प्रतिनिधियों ने गंभीर पर्यावरणीय चेतावनियों और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों पर तुंरत कार्रवाई का आह्वान किया।
दो हफ्तों तक चलने वाली इस बैठक में जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने के उपायों पर चर्चा की जाएगी। यह वार्ता पेरिस में तीन साल पहले ऐतिहासिक करार पर मुहर लगने के बाद हो रही है जिसमें वैश्विक तापमान में इजाफे को दो डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फारेनहाइट) से नीचे रखने का लक्ष्य निर्धारित करने पर सहमति बनी थी। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर यह बैठक यह मूल रूप से तय कार्यक्रम से एक दिन पहले हो रहा है और इसके 14 दिसंबर तक चलने की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्यालय की एक पूर्व प्रमुख क्रिस्टीना फिगुरेस ने कहा कि  भूराजनीतिक अस्थिरता के बावजूद, जलवायु सहमति बेहद लचीला रुख दे रही है।
ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा
जलवायु परिवर्तन पर इस बैठक में कई देशों के मंत्री और राष्ट्र प्रमुखों के सोमवार को आने की उम्मीद है। साथ ही इस वार्ता के दौरान मेजबान पोलैंड यह सुनिश्चित करने के लिये एक संयुक्त घोषणापत्र पर दबाव डालेगा कि कोयला उत्पादक जैसे जीवाश्म ईंधन उद्योग उचित ढंग से अपनी राह बदल सकें। साथ ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सके।
जी-20 सम्मेलन से प्रोत्साहन मिला
इस बैठक को हाल में संपन्न हुए जी20 शिखर सम्मेलन से अहम समर्थन मिला है। साथ ही 19 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने 2015 के पेरिस जलवायु समझौते का समर्थन किया। अमेरिका खुद को इससे दूर रखने वाला एक मात्र देश था जिसने घोषणा की कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व मं वह इस जलवायु करार से अलग हो रहा है।
पेरिस जलवायु समझौते में यह तय हुआ था
2015 पेरिस जलवायु समझौता पहला ऐसा समझौता है जिसके तहत सभी देश वैश्विक तापमान में वृद्धि को रोकने की प्रतिबद्धता जताते हैं जो कि मुख्य रूप से कोयला, तेल और गैस से होने वाले उत्सर्जन से होती है।
2020 में लागू होगा समझौता
समझौता 2020 में लागू होगा। साथ ही यह नवंबर 2016 में उस समय प्रभावी हुआ जब उसने 55 सदस्य देशों द्वारा अनुमोदन की सीमा पार कर ली और इसका अनुमोदन करने वाले वे सदस्य थे जो वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कम से कम 55 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकता है लेकिन ये बाध्यकारी अनुमोदन से ही होते हैं।
शीर्ष कार्बन प्रदूषक
विश्व के शीर्ष कार्बन प्रदूषकों में घटते क्रम में चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ और भारत हैं
सबसे बड़े प्रदूषक जिसने समझौते का अनुमोदन नहीं किया है वह रूस है जिसका स्थान 5वां है
इसके साथ ही तुर्की और ईरान ने भी जलवायु समझौते का अब तक अनुमोदन नहीं किया है
ऐसे बाहर निकल सकते हैं
समझौता पक्षों को हटने की इजाजत देता है लेकिन नोटिस प्रभावी होने के तीन वर्ष बाद दिया जा सकता है। उसके एक वर्ष बाद उससे हटा जा सकता है। जून 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका इससे हट रहा है। समझौते के नियमों के तहत ऐसा 4 नवंबर से पहले औपचारिक रूप से नहीं हो सकता जो कि अगले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के एक दिन बाद है।
यह लक्ष्य रखा गया है
डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है वैश्विक तापमान को पूर्व औद्योगिक क्रांति के स्तर से
1.5 डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापमान रखने का प्रयास भी है संभव हो तो
40 से 70 फीसदी की कटौती का लक्ष्य
संयुक्त राष्ट्र के विज्ञान परामर्श निकाय इंटरगवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अक्तूबर में निष्कर्ष निकाला कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तकनीकी रूप से संभव है लेकिन इसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेज और बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत होगी। आईपीसीसी के अनुसार दो डिग्री सेल्सियस की सीमा भी बड़ी चुनौती है। उसने गणना की कि उस लक्ष्य के लिए उत्सर्जनों में 2050 तक 40 से 70 प्रतिशत की कटौती होनी चाहिए।
कटौती का जायजा लेंगे
2020 में शुरू होने पर देश प्रत्येक पांच वर्ष पर वैश्विक तापमान में वृद्धि में कटौती में अपनी सामूहिक प्रगति का जायजा लेंगे जिसका उद्देश्य उत्सर्जनों में कटौती के राष्ट्रीय प्रयासों को बढ़ावा देना है।

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