by Dinesh Kumar
पिछले हफ्ते रिलीज हुई मशहूर फिल्म एक्टर संजय मिश्रा व अभिनेत्री महिमा चौधरी की बहुचर्चित फिल्म “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” ऐसी फिल्म है, जिसकी चर्चा होनी चाहिए और होती भी रहेगी, क्योंकि यह फिल्म बनारस की खूबसूरती के साथ तथाकथित परंपराओं के टूटने को लेकर भी बात करती है। फिल्म में संजय मिश्रा, महिमा चौधरी, व्योम यादव, पलक लालवानी, प्रशांत सिंह, प्रवीन सिंह सिसोदिया, नावनी परिहार, श्रीकांत वर्मा एवं धीरेंद्र गौतम ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं की है। एकता इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी इस फिल्म के लेखक प्रशांत सिंह हैं जबकि निर्देशन सिद्धांत राज सिंह ने किया है।
कहानीः यह फिल्म एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसमें तीन पुरुष पिता, पुत्र एवं मामा रहते हैं, इनके घर में कोई भी महिला नहीं है। परिवार के मुखिया दुर्लभ प्रसाद (संजय मिश्रा) की पत्नी का स्वर्गवास पुत्र मुरली (व्योम यादव) के पैदा होते ही हो गई होती है और मामा (श्रीकांत वर्मा) मांगलिक हैं, जिसकी वजह से उनकी शादी ही नहीं हो रही है। तीनों अपना सैलून चलाकर आराम से जिंदगी बिता रहे हैं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब मुरली क्षेत्र के दबंग व्यवसायी व भावी विधायक ब्रिज नारायण (प्रवीण सिंह सिसोदिया) की बेटी महक (पलक लालवानी) से प्यार कर बैठता है। यह बात महक के चाचा को पता चलती है तो वह अपने भाई को बताता है और महक को डांटा फटकारा जाता है साथ ही कहा जाता है कि हम अपनी बेटी की शादी ऐसे घर में बिल्कुल भी नहीं करेंगे, जिस घर में कोई महिला ही न हो। इसके बाद शुरु होता है असली खेल। दुर्लभ प्रसाद की शादी करवाने की कोशिशें शुरू होती हैं ताकि घर में एक महिला आ जाए और आसानी से मुरली की शादी महक से हो सके। ये लोग शादी करवाने वालों के पास जाते हैं, टिंडर पर एकाउंट बनाते हैं, इसके बावजूद भी दुर्लभ की शादी नहीं हो पाती और इसी बीच एंट्री होती है बबिता (महिमा चौधरी) की। अब क्या दुर्लभ प्रसाद की शादी हो पाती है? मुरली अपने प्यार को पाने में कामयाब होता है, या बबिता की एंट्री सबको जिस मोड़कर पर लाकर खड़ा करती है, उसके चलते क्या क्या बवाल होते हैं, यह सब जानने के लिए फिल्म “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” एक बार जरूर देखिए। वैसे फिल्म थिएटर के बाद ओटीटी पर भी आएगी, जिन लोगों ने इसे थिएटर में नहीं देखा उन्हें ओटीटी पर देखना चाहिए।
निर्देशनः फिल्म “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” का निर्देशन सिद्धांत राज सिंह ने किया है, उन्होंने बनारस के सुंदर लोकेशन और बढ़िया जगहों का चुनाव तो किया है, लेकिन सिक्वेंस में कुछ कमियां रह जाती हैं। लिखावट भी थोड़ी कमजोर होने की वजह से फिल्म उस तरह से नहीं बन पाती, जो बनना चाहिए था। स्क्रीनप्ले तो ठीक है लेकिन डॉयलॉग में वह कसावट नहीं दिखती जो होनी चाहिए। इसीलिए फिल्म थोड़ी सी चूक गई। कहने मतलब बहुत अच्छी फिल्म बन सकती थी, जो बनते बनते रह गई।
एक्टिंगः संजय मिश्रा की एक्टिंग का तो कोई जवाब नहीं, महिमा चौधरी सुंदर भी लगी हैं, और जितना उनके हिस्से आया उसे अच्छा किया भी है। बावजूद इसके कहीं कुछ तो मिसिंग लगता है। व्योम की एक्टिंग अच्छी है, वे लंबी रेस घोड़ा साबित होंगे बशर्ते उन्हें डायलॉग डिलीवरी के लिए काफी काम करने की जरूरत है। पलक को भी अपने एक्टिंग स्केल पर काम करना पड़ेगा, श्रीकांत वर्मा व प्रवीण सिंह सिसोदिया भी वह छाप नहीं छोड़ पाते जिसकी उम्मीद थी। नावनी परिहार एवं धीरेंद्र गौतम सहित बाकी कलाकार भी सामान्य रहे हैं।
गीतः फिल्म गीत के मामले में भी काफी पिछड़ गई, विषय अच्छा है, लोकेशन भी बढ़िया चुना लेकिन गीत प्रभावी नहीं बन पाए।
कुल मिलाकर फिल्म “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” अच्छी तो है, लेकिन कई मामलों में छाप छोड़ने में विफल रहती है। फिल्म को “सुरभि सलोनी” की तरफ से ढाई स्टार।

