मुंबई। कालबादेवी के तेलवाड़ी इलाके में गटर में सोना ढूंढने उतरे दो युवकों की जहरीली गैस से मौत की खबर ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी है। इस घटना के बाद व्यापारियों, कारीगरों और स्थानीय लोगों के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या यह सिर्फ एक हादसा है या आने वाले बड़े खतरे की चेतावनी?
क्या किसी ने सोचा है कि इन तंग गलियों में स्थित 10×10 फीट की छोटी-छोटी खोलियों में 12-15 युवा कारीगर दिन-रात कैसे काम करते हैं? जहां वे काम ही नहीं, बल्कि खाते-पीते, नहाते और सोते भी हैं, क्या वहां की हवा सुरक्षित है?
क्या यह सच नहीं कि स्वर्ण आभूषण बनाने वाले अनेक कारखानों में उपयोग होने वाले रसायन और एसिड का अवशेष नालियों में बहाया जाता है? यदि हां, तो क्या इन नालियों से उठने वाली जहरीली गैस धीरे-धीरे इन कारीगरों के फेफड़ों को खोखला नहीं कर रही?
जब गटर में उतरे दो युवक कुछ ही मिनटों में अपनी जान गंवा बैठे, तो क्या यह मान लिया जाए कि ऊपर रहने और काम करने वाले सैकड़ों युवाओं के शरीर रोज़-रोज़ उसी जहर को सहन कर रहे हैं?
क्या यह भी चिंता का विषय नहीं कि आसपास के कपड़ा व्यापारियों और दुकानदारों को भी दिनभर इन्हीं रसायनों से भरी हवा में सांस लेनी पड़ती है? क्या वे अनजाने में इस जहर के आदी हो चुके हैं, या यह धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है?
और उन लाखों लोगों का क्या, जो हर दिन जवेरी बाजार, कपड़ा बाजार और मुंबादेवी मंदिर के दर्शन के लिए यहां आते हैं? क्या उनकी सांसों में भी यही जहरीली हवा नहीं घुल रही?
गर्मी के इन दिनों में, जब तापमान बढ़ रहा है, इन तंग और बंद खोलियों में भेड़-बकरियों की तरह भरे युवा कारीगर किस हालात में जी रहे हैं? क्या किसी ने उनके स्वास्थ्य, उनकी जिंदगी और उनके भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचा है?
सबसे बड़ा सवाल-क्या हर बार ऐसी घटना के बाद ही जागेंगे हम? क्या और कितनी मौतों का इंतजार है, जब तक प्रशासन सख्त कदम उठाएगा? घटना के बाद मुंबई पुलिस और फॉरेंसिक टीम जांच में जुटी है, लेकिन इलाके में फैले डर और सवालों के जवाब अभी भी अधूरे हैं। आज दो युवकों की जान गई है… कल कौन होगा अगला?
डरावनी हकीकत: कालबादेवी में जहरीली गैस का कहर, दो युवकों की मौत-क्या अगला नंबर किसका?

