आइये आपकी बीमारी का व्यपार करें

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आदित्य तिक्कू।।
बचपन में सुनते थे डॉक्टर ईश्वर का रूप होते हैं व साथ में यह भी कि सुनी सुनाई बातों पर यकीं नहीं करना चाहिए। इन्ही दो बातों में असमंजस में रहा। डॉक्टर को ईश्वर मानू या नहीं? जिस तरह से हमारे राष्ट्र में चिकित्सा व्यवस्था धीरे-धीरे सरकारी तंत्र से फिसल कर निजी हाथों में जा रही है, वैसे-वैसे एक बड़ी आबादी उसके दायरे से बाहर होती जा रही है। विडंबना यह है कि किसी बीमारी के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में कई गुना ज्यादा रकम चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद लोगों के सामने विकल्प सिमटते जा रहे हैं। या तो वे इलाज के नाम पर कई गुना ज्यादा पैसे चुकाने पर मजबूर हैं या फिर बेहतर चिकित्सा से वंचित रह जाते हैं। हालांकि अनेक अध्ययनों में इलाज के महंगे होने के तथ्य सामने आते रहे हैं, लेकिन अब खुद राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह बताया गया है कि देश के निजी क्षेत्र के अस्पतालों में लोगों को इलाज कराने के लिए सरकारी अस्पतालों की तुलना में सात गुना ज्यादा अधिक धन खर्च करना पड़ता है।
स्वयं सरकार के किसी महकमे की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया जा रहा है तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि इलाज में खर्च का इतना बड़ा फर्क सरकार की नजर में है। गौरतलब है कि गर्भवती महिला के प्रसव पर एक सरकारी अस्पताल में कुल खर्च जहां तकऱीबन ढाई हजार रुपए से भी कम आता है, वहीं किसी निजी अस्पताल या क्लीनिक में इसी मद में करीब इक्कीस हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं।
यदि आप खबरों पर थोड़ी सी भी नजऱ रखे या संवेदन हो सजग रहें तो ऐसी खबरें आम रही हैं कि अच्छी चिकित्सा के नाम पर निजी अस्पतालों में किस तरह मनमाने तरीके से पैसे वसूले जाते हैं और कई बार जरूरत नहीं होने पर भी इलाज को जटिल बना कर पेश किया जाता है व कई बार तो मृत व्यक्ति को भी कई-कई दिनों वेंटीलेटर पर रखा जाता है बीमारी का बिल ऑन रखने के लिए। अगर प्रसव को उदाहरण मानें तो सरकारी अस्पतालों में जहां महज सत्रह फीसद मामलों में ऑपरेशन किया गया, वहीं निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा पचपन फीसद है। इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में ऐसे ऑपरेशन या तो मुफ्त किए जाते हैं या फिर किसी परिवार को बहुत कम खर्च करना पड़ता है। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों में आने वाले खर्च के बारे में शायद अलग से बताने की जरूरत नहीं है।
इस अंतर को सोचिये और डरिये जहां एक वक्त का भोजन करने में लोग असमर्थ हैं, मात्र भोजन- पौष्टिक भोजन की बात नहीं कर रहा हूं वर्ना शायद 90 प्रतिशत आबादी इस सूची में खड़ी हो जाएगी। विकास को अंगूठा दिखाते हुये वहां चिकित्सा व्यवस्था मुस्करा कर कह रही है आइये आपकी बीमारी का व्यपार करें और विश्व में पताका लहरायें कि हमारे यहां इलाज सबसे सस्ता होता है……..पेपर पर।

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