क्या कहती है मानसून की यह करवट

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महेश पलावत।।
अक्तूबर का महीना शुरू हो चुका है और आमतौर पर इस समय तक मानसून की आधिकारिक विदाई हो जाती है। मगर इस बार देश के कई हिस्सों में बारिश अब भी जारी है। माना जा रहा है कि उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की रवानगी 10 अक्तूबर से शुरू होगी। भारत में मानसून का सफर केरल तट से शुरू होता है और पूरे देश में बारिश कराने के बाद यह फिर इसी तट से वापस लौट जाता है। पिछले कुछ वर्षों में इस पर अल नीनो का प्रभाव बढ़ा है। अल नीनो की वजह से ही इस साल शुरुआती दिनों में सूखे की स्थिति दिखी, लेकिन बाद में भारी बारिश हुई, और एक ही मानसून में हमें सूखा और बाढ़, दोनों अनुभवों से गुजरना पड़ा। सितंबर के अंत में इसका मिजाज कुछ यूं बदला कि पटना जैसे शहर अप्रत्याशित बाढ़ में डूब गए।
बहरहाल, अपने यहां मौसम के पूर्वानुमान की गणना क्लाइमेट फॉरकास्ट सिस्टम (सीएफएस वी2) नामक वैश्विक मॉडल से की जाती है। इससे पता चलता है कि अगले तीन-चार महीनों में मौसम की दशा-दिशा क्या होगी और कहां-कितनी बारिश होगी या कितनी धूप की रोशनी खिलेगी? इसमें अल नीनो और ला नीना के प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है। अल नीनो प्रभाव तब पैदा होता है, जब प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग में समुद्री सतह का तपामान सामान्य से ज्यादा हो जाता है। इसकी वजह से पेरू व दक्षिण अमेरिका में ज्यादा बारिश होती है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में कम।
इस बार भी अनुमान लगाया गया था कि अल नीनो की सक्रियता रहेगी और भारत, खासतौर से इसके उत्तरी हिस्से में सामान्य से कम बारिश होगी। आकलन यह भी था कि अल नीनो प्रभाव जुलाई से कम होता जाएगा और फिर ‘न्यूट्रल’ (अल नीनो का प्रभाव खत्म होना) की स्थिति बन जाएगी। चूंकि न्यूट्रल स्थिति में भी मानसून ज्यादा अच्छा नहीं रहता, इसलिए तमाम पूर्वानुमानों में ‘सामान्य से कम’ बारिश की बात कही गई थी। मगर पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान अनुमान से पहले कम होने लगा, जिससे अल नीनो का प्रभाव जल्द ही खत्म हो गया और समय-पूर्व ‘न्यूट्रल’ की स्थिति बन गई।
जब अल नीनो सक्रिय रहता है, तो हिंद महासागर द्विध्रुव (इंडियन ओशन डायपोल-आईओडी) आमतौर पर असरकारी नहीं रहता। आईओडी के कारण हिंद महासागर और अरब सागर की सतह का तापमान बढ़ जाता है, जिससे हमारे यहां मानसूनी बारिश तेज हो जाती है। मगर चूंकि यह क्षेत्रीय कारक है और अल नीनो वैश्विक, इसलिए मौसम के आकलन में अल नीनो को ज्यादा तवज्जो दिया जाता है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय कारक ही प्रभावी साबित हुआ है। आज से पहले यह स्थिति 1997 में दिखी थी, जब अल नीनो प्रभाव के बाद भी बादल छाए रहे और तेज बरसात होती रही।
हमारे देश में विशेषकर दक्षिण-पश्चिम मानसून बनने में मैडेन जूलियन ऑसीलेशन (एमजेओ) भी अहम भूमिका निभाता है। एमजेओ असल में गरम हवा के कारण उष्णकटिबंधीय मौसम में होने वाला उतार-चढ़ाव है। जब-जब हिंद महासागर में यह कारक सक्रिय होता है, तब-तब भारत में मानसून तेज हो जाता है। अप्रैल के महीने में, जब मानसून की भविष्यवाणी की जाती है, इसका आकलन मुश्किल है। इस साल यह हवा अगस्त और सितंबर में दो बार हिंद महासागर से गुजरी, जिससे देश के कुछ हिस्सों में अप्रत्याशित बरसात हुई और मानसूनी बारिश सामान्य से 53 फीसदी ज्यादा हुई।
सवाल यह है कि क्या यह प्रवृत्ति आगे भी दिखेगी? फिलहाल यह बताना आसान नहीं होगा। अभी यह अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता कि अगले साल अल नीनो असरकारी होगा, ला नीना (अल नीनो से विपरीत इसमें समुद्री सतह का तापमान कम हो जाता है और पश्चिमी प्रशांत महासागर के इलाकों में अच्छी बारिश होती है) रहेगा या फिर न्यूट्रल स्थिति बनेगी। अगले साल आईओडी को नजरंदाज करने का जोखिम भी वैज्ञानिक शायद ही उठाना पसंद करेंगे। मगर इन सबमें एक बात तय है कि मानसून पर जलवायु परिवर्तन का असर साफ-साफ दिखेगा। ‘क्लाइमेट चेंज’ के कारण ही पिछले कुछ वर्षों में अल नीनो प्रभाव कहीं अधिक तीव्रता से और अनवरत असरकारी होने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव भी बढ़ेगा, जिससे मानसूनी बारिश कहीं ज्यादा प्रभावित होगी।
जलवायु परिवर्तन किस कदर मानसून को प्रभावित कर रहा है, इसे अपने यहां के कुछ आंकड़ों से भी समझ सकते हैं। भारत में मानसून का अब एक खास पैटर्न दिखने लगा है। हम एक अंतराल के बाद सूखे से जूझने लगे हैं। इसी सदी में साल 2002, 2004, 2009, 2014 और 2015 में हमने सूखा झेला, जबकि साल 2000, 2001, 2012, 2017 और 2018 में सामान्य से कम बारिश हुई। मौजूदा दशक (2011-2020) में 2018 तक हुई मानसूनी बारिश का अगर अध्ययन करें, तो यह औसतन 835 मिलीमीटर है, जबकि मानसूनी मौसमी वर्षा का दीर्घकालिक औसत (एलपीए) 887 मिलीमीटर है।
जाहिर है, हम अब कम वर्षा वाले युग में प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से मानसूनी वर्षा सामान्य से कम होती जाएगी, जिसका नुकसान अंतत: मानव जाति को ही होगा। बेशक इस साल सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है, लेकिन यह प्रवृत्ति शायद ही आगे बनी रहेगी। अभी की मानसूनी बारिश को हमें अपवाद ही मानना चाहिए।

Thanks:www.livehindustan.com

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