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महंगाई पर नियंत्रण के लिए, अन्य विकल्पों पर भी सोचे सरकार?

आज प्रत्येक दूसरा व्यक्ति महंगाई से परेशान है फिर चाहे घरेलु उपयोग की वस्तुएं हो, स्वास्थ्य सेवाए हो, शिक्षा का क्षेत्र हो या अन्य कोई भी क्षेत्र। यदि कहा जाए की महंगाई अपने चरम पर है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस महंगाई से लड़ने के लिए या यूँ कहें नियंत्रित करने के लिए सरकार परम्परागत तरीकों पर लगातार कार्य कर रही है। पर वर्तमान आर्थिक परिवेश में क्या वास्तव में ये परम्परागत तरीके पूर्ण रूप से उपयोगी है या फिर सरकार को अन्य विकल्पों पर भी कार्य करने की जरूरत है। एक दो नहीं बल्कि कई ऐसे कठोर निर्णय लेकर देश के प्रधानमंत्री जी ने आम जनता को यह जताने की पूरी कोशिश की है की आम आदमी का हित उनके लिए सर्वोपरी है पर जमीनी रूप से कई बातें उनके तथ्यों का साथ नहीं देती है उनमे से प्रमुख बेरोजगारी और महंगाई है। आइये जानने का प्रयास करतें है की सरकार द्वारा महंगाई को नियंत्रित करने का जो परम्परागत तरीका अपनाया गया है उसके अलावा अन्य मजबूत विकल्प क्या है ?
देश में जब महंगाई बढ़ती है तो उसे नियंत्रित करने के लिए कई विकल्पों में से एक मुख्य विकल्प है कर्ज की दरों में वृद्धि करना और बचत योजनाओं पर ब्याज में वृद्धि करना, जिससे बाजार में महंगाई बढ़ाने वाला पैसा बैंकों के पास आ जाता है और महंगाई नियंत्रित हो जाती है। विगत पांच महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार चार बार वृद्धि की है (रेपो रेट – वह दर होती है जिस पर आर.बी.आई. बैंको को ऋण देता है और बैंक अपने खर्चो को जोड़ कर के आम नागरिकों के लिए ऋण की दर निर्धारित करतें है) – 4 मई 22, .40 बेसिस प्वाइंट, 8 जून 22, .50 बेसिस प्वाइंट, 5 अगस्त 22, .50 बेसिस प्वाइंट, 30 सितम्बर 22, .50 बेसिस प्वाइंट। 4 मई 22 के पहले रेपो रेट 4.00% था अभी 5.90% है, इसका मुख्य उद्देश्य महँगाई को नियंत्रित करना रहा है। की गयी वृद्धि का सीधा भार आम जनता को ही पड़ने लगा है। रेपो रेट में वृद्धि होने पर पहले से चल रहे विभिन्न ऋण की ईएमआई में वृद्धि हो सकती है या फिर बैंक लोन अवधि में वृद्धि भी कर सकता है, जबकि मौजूदा ब्याज दर पर नए ग्राहकों को ऋण दिया जाता है।
एक उदहारण से समझते है, मान लीजिए विवेक नाम के किसी व्यक्ति ने छह महीने पहले 6.5% की ब्याज दर पर बैंक से दस लाख रुपये का ऋण 10 वर्ष के लिए लिया है। उस समय उसके ऋण की ईएमआई रुपया 11,355 मासिक थी। तब से अब तक रेपो रेट में 1.90 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की गई है। अब बैंक 1.90% अधिक चार्ज करेगा तो अब उपरोक्त लोन की ब्याज दर 6.5% से बढ़कर 8.4 प्रतिशत हो जाएगी। यानि की अब विवेक को ऋण पर नई ईएमआई 8.4% की ब्याज दर के हिसाब से 12,345 रुपये प्रति महीने देना होगा। ऐसे में विवेक को अब बीते मई 22 महीने की तुलना में अपने लोन पर मासिक 990 रुपये अधिक चुकाना पड़ेगा। इस वृद्धि के पश्चात् अब अनेकों सवालो ने जन्म भी ले लिया है जिसका सीधा सरोकार आम जनता से है।
सरकार द्वारा रेपो रेट में वृद्धि की उठाये गए क़दमों को कई विशेषज्ञ जरुरी मान रहे है जबकि कई लोगों का इस पर अलग मत है, मसलन ईपीएफ, पीपीएफ, समेत कई सरकारी योजनाओं में निवेश पर प्राप्त होने वाले ब्याज की दर में सरकार ने अभी तक कोई भी वृद्धि नहीं की है। जबकि निवेश की जिन योजनाओं में ब्याज दर में वृद्धि की गयी है वह ऋण में की गयी वृद्धि की तुलना में नाम मात्र है। ऐसे में महंगाई की दर को नियंत्रित करने के दिपक्षीय व्यवस्था का लाभ नहीं मिल पायेगा। कोरोना काल के पश्चात् लोगों की आय में कमी और बेरोजगारी दर में वृद्धि होने की वजह से अनेकों लोगों द्वारा ऋण के इस भार को बड़ी मुश्किल से चलाया जा रहा है ऐसे में वृद्धि कर देने से अनेकों लोगों को समस्या होने लगी है। कुछ लोगों का मत है कि बड़े व्यावसायिक घराने बैंकों से ऋण लेकर वापस नहीं करते इसलिए महंगाई को नियंत्रित करने के नाम पर रेपो रेट में वृद्धि करके आम आदमी से कॉर्पोरेट घराने के डूबे हुए ऋण की भरपाई आम जनता से की जा रही है।
महंगाई नियंत्रित करने के उद्देश्यों को मूल रूप से समझा जाए और मजबूत विकल्प की बात की जाए तो सरकार को अविलम्ब ऐसी व्यवस्था लागू कर देनी चाहिए – रुपया 200 से बड़े नोटों का प्रचलन बंद कर दिया जाए और सभी भुगतानों को डिजिटल माध्यम से कर दिया जाए तो महंगाई पर व्यापक नियंत्रण किया जा सकता है और यह परम्परागत तरीकों की अपेक्षा अत्यधिक प्रभावशाली होगा। बाजार में उपस्थित काले धन की वजह से / कैश लेन-देन करने की वजह से महंगाई बढ़ने में वृद्धि हुई है। जबकि ऋण और बचत की योजनाओं में वृद्धि करने पर हमेशा मध्यम वर्ग ही पिसता चला जाता है जो ईमानदारी से न केवल आय अर्जित कर रहा है बल्कि अपने प्रति निर्धारित समस्त सरकारी दायित्वों की पूर्ति भी कर रहा है। अब समय आ गया है की महंगाई को नियंत्रित करने के परम्परागत तरीकों पर काम करने के बजाय सरकार कठोर कदम उठाये, जिससे स्थायी तौर पर महंगाई पर नियंत्रण किया जा सकें। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो देश में महंगाई कई रूपों में और क्षेत्रो में हमेशा विद्यमान रहेगी।

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