- पर्वाधिराज पर्युषण का चतुर्थ दिवस वाणी संयम दिवस के रूप में आयोजित
- युगप्रधान अनुशास्ता ने त्रिपृष्ठ के भव का विस्तार से किया वर्णन
- युवाचार्यश्री ने सत्य धर्म को किया व्याख्यायित
- साध्वीप्रमुखाजी ने वाणी संयम दिवस पर दी मंगल प्रेरणा
- लोकवाद को साध्वीवर्याजी ने किया विवेचित
11.09.2026, शुक्रवार, लाडनूं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता की मंगल सन्निधि में पर्वाधिराज पर्युषण को आध्यात्मिक रूप में मनाया जा रहा है। अष्टदिवसीय इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में चतुर्विध धर्मसंघ जुटा हुआ है। नित्य प्रति आध्यात्मिक अनुष्ठान से जैन विश्व भारती का पूरा परिसर आध्यात्मिक आवरण से आच्छादित नजर आ रहा है।
पर्वाधिराज पर्युषण का चतुर्थ दिवस वाणी संयम दिवस के रूप में समायोजित हुआ। साध्वी प्रांजलयशाजी आदि साध्वीवृंद ने वाणी संयम दिवस पर आधारित गीत का संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने लोकवाद को व्याख्यायित किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने वाणी संयम दिवस पर श्रद्धालुओं को प्रेरणा प्रदान की। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने सत्य धर्म को विवेचित किया।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान महावीर की आत्मा अपने अठारहवें भव में पोतनपुर के राजा प्रजापति के रूप में जन्म लेती है और वहां उसका नाम त्रिपृष्ठ हुआ। उस समय के प्रति वासुदेव अश्वग्रीव द्वारा अपने मृत्यु आदि के संदर्भ में ज्योतिष से सम्पर्क करता है तो पंडितजी द्वारा हंता के दो लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा कि जो राजकुमार आपके चंडवेग नाम के राजदूत का अपमान करेगा, वहीं आपका हंता होगा। आपके क्षेत्र में आतंक फैलाने वाले शेर को मार देगा, वह आपका हंता होगा। यह जानकर प्रति वासुदेव चिंतित हो गया। थोड़ा समय बीतने पर अश्वग्रीव का राजदूत चंडवेग अन्य राज्य के राजाओं तक जाकर संदेश पहुंचाने का कार्य करता था। राजदूत ऐसा कि उसमें स्वयं का विवेक भी होना अपेक्षित होता है। कब, कहां और कैसे, क्या करना, इसका विवेक राजदूत में होना आवश्यक होता है। वह अपनी यात्रा के दौरान पोतनपुर के राजा के राजसभा में पहुंचा तो उस समय वहां मनोरंजन का क्रम चल रहा था। उसके पहुंचने से कार्यक्रम भंग हो गया तो त्रिपृष्ठ को बुरा लगा और उसने दूत चंडवेग का अपमान कर दिया। दूत चंडवेग अपनी यात्रा सम्पन्न कर प्रति वासुदेव अश्वग्रीव के पास पहुंचा तो उसने अपनी यात्रा का वृत्तांत बताने के दौरान पोतनपुर में हुई अपमान की घटना को भी प्रस्तुत किया। दूत के अपमान की घटना सुनते ही अश्वग्रीव सावधान हो गया।
अश्वग्रीव के सामने एक समस्या आई कि किसानों की खेत में शेर आने लगा तो उसने अपने अधीन राजाओं को एक-एक दिन सुरक्षा करने की बारी लगा दी। उस क्रम में पोतनपुर के राजा प्रजापति रक्षा के लिए चले तो उनके पुत्र त्रिपृष्ठ और अचल वहां से सुरक्षा के लिए निकल लिए। किसी भी समस्या के मूल पर ध्यान देना चाहिए। यहां त्रिपृष्ठ ने समस्या के मूल को देखा और शेर की गुफा की ओर ही चल पड़े। शेर आया तो उसे देख त्रिपृष्ठ भी अपने शस्त्रों को छोड़ निहत्थे ही चल पड़ा।
आचार्यश्री ने वाणी संयम दिवस पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि वाणी मानव जीवन का एक अंग है। यह लब्धि प्राप्त है। इसका उपयोग और अनुपयोग कैसे करें, इसका विवेक होना चाहिए। जो भी बोलें संयमपूर्वक बोलने का प्रयास करें तो उपयोग हो सकता है और अनुपयोग करना हो तो मौन करने का प्रयास करना चाहिए। वाणी से नहीं बोलना भी साधना का प्रयोग है। वाणी से झूठ और कपट और कटु नहीं बोलना चाहिए। इस प्रकार आदमी को अपनी भाषा पर संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। आगम में बताया गया है कि मितभाषी यथा कम बोलने का प्रयास होना चाहिए, अनावश्यक बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। बोलें तो मृदु बोलने का प्रयास करना चाहिए। अनावश्यक नहीं बोलना भी मौन है। इस प्रकार सभी को अपनी वाणी का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। इससे आदमी कर्म बन्धनों से बच सकता है। पर्युषण पर्वाधिराज का पांचवा दिन व्रत चेतना दिवस के रूप में समायोजित होगा।

