नवाबगंज:प्राचीन काल में मिट्टी के अखाड़े पर लड़ी जाने वाली कुश्ती दशकों से गायब चल रही है। जो अब वर्तमान समय में मैट पर लड़ी जा रही है। ‘माटी के लाल माटी में ही दिखाएं कमाल।’ ऐसी सोच से एक बार फिर पूरी दुनिया में पारंपरिक तरीके से ही कुश्ती लड़ने खातिर मिट्टी के अखाड़े को मान्यता दी गई है। विश्व कुश्ती संघ ने इस पर मुहर भी लगा दी है। अब इसकी शुरुआत नये साल 2019 में जनवरी माह में भारत देश से होने जा रही है। यह जानकारी मंगलवार देर शाम राष्ट्रीय कुश्ती संघ अध्यन सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने हिन्दुस्तान से विशेष बातचीत में दी।
उन्होंने बताया कि दरअसल गांव-देहात के लोगों के पास इतनी रकम नहीं है कि वे अपने बच्चों के खेलने के लिए आधुनिक संसाधनों को खरीदकर ला सकें। पहले के समय में लगभग गांवों में अखाड़े बने दिखते थे। जहां सुबह-शाम के वक्त तमाम युवा कुश्ती लड़ते थे। अब ऐसा गायब सा हो गया है। इसके पीछे बेरोजगारी मुख्य वजह है। पारंपरिक तरीके से मिट्टी के अखाड़े में लड़ी जाने वाली कुश्ती में बदलाव हो गया। मिट्टी के बजाय मैट पर लड़ने की आधुनिक व्यवस्था प्रतियोगिताओं में हो गई। इसे पुन: उसके ही स्वरूप में लाने के लिए विभिन्न कुश्ती संघ ने कोशिश शुरू की। जिसे अब मान्यता भी मिल गई। विश्व कुश्ती संघ ने इसे मान्यता देते हुए मिट्टी के अखाड़े पर कुश्ती लड़ाने का निर्णय ले लिया है। एशियन कुश्ती संघ व भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष कैसरगंज के सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने बताया कि अब पूरी दुनिया मे मिट्टी के अखाड़े पर होने वाली कुश्ती पारम्परिक शुरुआत फिर से हो रही है।
2019 से होगा आगाज:
इसका आगाज जअगले वर्ष 2019 में जनवरी माह में भारत में आयोजित होने वाले पहले नेशनल चैम्पियनशिप में होगा। इसके लिए अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कुश्ती संघ ने साझा प्रयास शुरू कर दिये हैं। इसका प्रस्ताव भी प्रधानमंत्री कार्यालय से स्वीकृत हो गया है।
अब माटी के लाल माटी में ही दिखायेगें कमाल, विश्व कुश्ती संघ ने दी मान्यता

