आदित्य तिक्कू।।
श्रीलंका एक दशक पहले आतंकी संगठन लिट्टे के खात्मे होने के बाद शांति और स्थिरता की ओर बढ़ रहा था। दिन प्रतिदिन विश्व की रफ़्तार के साथ बढ़ने के लिए प्रयत्नशील था, लेकिन 21 अप्रैल की सुबह फिर से भीषण आतंकी हमले से दो-चार हुआ श्रीलंका के साथ ही पूरी दुनिया के लिए बेहद खौफनाक है। तीन चर्चों और इतने ही होटलों के साथ कुछ और स्थानों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले में तीन सौ से अधिक लोगों का मारा जाना यह बताता है कि ये हमले किसी बड़ी सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों से भरे रहने वाले होटलों के साथ जिस तरह चर्चो को खासतौर पर निशाना बनाया गया, उससे यह साफ है कि आतंकी ईसाई समुदाय के लोगों को निशाना बनाना चाह रहे थे। इसीलिए चर्चो में तब विस्फोट किए गए जब वहां ईस्टर की विशेष प्रार्थना हो रही थी।
इस्लामिक स्टेट ने श्रीलंका में ईस्टर के दिन हुए भयानक आत्मघाती हमलों की जिम्मेदारी ली। इन हमलों में 321 लोगों की मौत हो गयी और 500 से अधिक लोग घायल हो गये थे। इस अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन ने अपनी प्रचार संवाद समिति ‘अमाक के मार्फत एक बयान में कहा, ”परसों श्रीलंका में अमेरिका की अगुवाई वाले गठबंधन के सदस्यों और ईसाइयों को निशाना बना कर जिन लोगों ने हमला किया, वे इस्लामिक स्टेट समूह के लड़ाके हैं।” इस बयान में हमलावरों की पहचान अबु उबायदा, अबु अल मुख्तार, अबु खलील, अबु हम्जा, अबु अल बारा, अबु मुहम्मद और अबु अब्दुल्लाह के रूप में की गयी है। बयान में यह भी बताया गया है कि किसने कहां हमला किया।
श्रीलंका अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होने के बजाय बीते कुछ समय से अपनी ही राजनीतिक उठापटक से त्रस्त है। यह एक हकीकत है कि जब किसी देश में शासन व्यवस्था सुदृढ़ न हो और राजनीतिक अस्थिरता का अंदेशा हो तो अराजक, अतिवादी और आतंकी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिलता है।
पश्चिम एशिया और साथ ही आए दिन आतंकी हमलों से जूझने वाले देशों को छोड़ दें तो श्रीलंका न्यूजीलैंड के बाद सबसे भयानक हमले का शिकार बना है। न्यूजीलैंड के मुकाबले श्रीलंका में चार गुना ज्यादा लोग मारे गए हैं। घायलों की संख्या भी कहीं अधिक है। श्रीलंका को दहलाने वाले आतंकी हमले भारत के लिए भी चिंता का कारण है, क्योंकि एक तो ये ऐसे पड़ोसी देश में हुए जहां हमारे हित निहित हैं और दूसरे ये हमले 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की याद दिला रहे हैं। विडंबना यह है कि तब से लेकर आज तक विश्व समुदाय आतंकवाद की परिभाषा भी तय नहीं कर पाया है।
लहूलुहान श्रीलंका एक बार फिर यह बता रहा है कि आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि पूरी दुनिया अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे श्रीलंका को दिलासा और सहारा दे, बल्कि यह भी देखे कि किस्म-किस्म के आतंकवाद से कैसे निपटा जाए? ऐसा करते समय इस पर भी ध्यान देना होगा कि आतंकवाद से लड़ाई के तौर-तरीके सफल कम हो रहे हैं, अतिवाद को हवा अधिक दे रहे हैं। यह अतिवाद शांति और सहिष्णुता की बलि लेने के साथ विभिन्न वर्गो के बीच अविश्वास बढ़ा रहा है। त्रासदी यह है कि ऐसे समय भी चीन जैसे देश पाकिस्तान में पल रहे आतंकी सरगना की ढाल बनना पसंद कर रहे हैं जबकि स्वयं के देश में अपनी विचारधारा के विपरीत जीवनशैली जीवन निर्वहन करने वालों पर कहर बरपाता है। हमला हमारे पड़ोस में हुआ हो, पर उनके दर्द का अहसास हमें है। अपनों को खोने का व देश लहू लुहान होने का दर्द क्या होता है, यह आखिर हमसे अधिक कौन समझता होगा। यह स्पष्ट है कि दुनिया में मानवता ऐसे ही दम तोड़ती रहेगी, जब तक आतंक का अंत न हो जाए।

