वसई। वसई की पावन धरा पर जिनवाणी की गंगा का निरंतर प्रवाह हो रहा है साध्वी विश्ववंदना ने आनन्द अम्बेश अजित दरबार मे उपस्थित धर्म प्रेमी बंधुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञानी के निर्देशों को समझने के लिए ज्ञानी के समीप में वास करना ज्ञानी के समीप में वास करने वाले ज्ञानी के ज्ञान का अनुभव प्राप्त होता हैं। ज्ञानी के हर भावों को समझने का अवकाश प्राप्त होता हैं। ज्ञानी के साथ में रहने वाले को ज्ञानी की हर प्रवृति का सम्यक रूप से बोध होता हैं। ज्ञानी की शुद्ध क्रिया से हमें हमारी आत्मा की सुंदरता सम्यकता के दर्शन होते हैं। ज्ञानी की साधना को समझने वाले अपने सम्यक विवेक भाव से आत्मा के शुद्ध भावों मान्यता प्राप्त होती हैं। शुद्ध मान्यता ही शुद्ध विचारों और आचारों की सर्जक बनती हैं। वही शुद्ध मान्यता आत्म उत्थान में विशेष रूप से सहायक बनती है। साथ ही हमारे जीवन मे हो रहे अशुद्ध भाव की प्रवृत्तियो को निवृत्ति होती है।
ज्ञानी का ज्ञान ही मिथ्या भावों का निराकरण करके अज्ञान अंधकार को दूर सत्य ज्ञान को प्रकाशित करता है, इसीलिए शास्त्रकार भगवंत यहां बताते हैं कि गुरूण युववायकारह अगर आत्मा की शुद्ध दशा के दर्शन करने हैं तो ज्ञानी गुरुजनों के पास रहो। उनके सानिध्य का सेवन करो वह सानिध्य हमें सत्य के दर्शन कराएगा। आत्म ज्ञान से आत्म विज्ञान का पता चलेगा और वह आत्मज्ञान से आत्मायें अपूर्व रहस्यों को उजागर करता है। ज्ञानियों का संग ही आत्मा के रंगों में रंगने में समर्थन शक्तिशाली बनता है, ज्ञानी के ज्ञान के रंगों में रंगे हुए आत्माए आत्म स्वभाव से विपरित आचरणों में आगे न बढ़ते हुए विपरीतता आचरणों पर नियंत्रण हो जाता है और विपरीत के नियंत्रण से सहजता से बचने का अवकाश प्राप्त होता हैं। नियंत्रित आत्मा स्वंय सम्भालने में सक्षम बनती है। यही आत्मा को उध्वर्ता की और ले जाने में मदद रूप बनता और आत्मा की अघमता से दूर हो जाती है, इसीलिए ज्ञानी गुरुजनों का संग आत्महित साधकों को करना आवश्यक है।
आध्यात्म आगम मेरी दृष्टि मेंः विश्ववंदना जी

