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ज्योति – पर्व – दीपावली

Last updated: November 6, 2018 3:44 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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साध्वी अणिमाश्री जी

हर घर को रोशन करने वाला यह दीवाली का त्यौहार सदियों से मनाया जा रहा है। जीवन के हर उच्छवास को नया अंदाज देने वाला यह त्यौहार जन-जन में नई उमंग व नई तरंग को पैदा करता है। समूची भारतीय परम्परा का यह एक अलौकिक त्यौहार है, जिसके साथ अनेक परम्पराएं एक साथ जुड़ी हुई है। ज्योति पर्व दीवाली का संबंध जैन परम्परा में भगवान महावीर के साथ जुड़ा हुआ है। जैन वांग्यम के अनुसार कार्तिक कृष्णा अमावस्या की मध्यरात्री में जैन परम्परपा के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया। पावापुरी में महावीर निर्वाण के वे पल नया संदेश लेकर आए थे। सुरलोक से आने वाले देवों के विमानों के दिव्य प्रकाश में मां वसुंधरा उज्ज्वल बन गई थी। पूरा नगर विद्युत गुटिका की तरह बन गया। धरती के अनेक सम्राटों ने भी दीप जलाकर महोत्सव मनाया। उसी पुनीत पल की जीवन्त स्मृति में आज भी दीप जलाकर यह त्यौहार दीपावली के नाम से मनाया जाता है।
इस पर्व के साथ अनेक महापुरुषों के जीवन का स्वर्णिम इतिहास जुड़ा हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, महाराजा युधिष्ठिर, स्वामी दयानंद सरस्वती भारतीय वसुधा के ये उज्ज्वल नक्षत्र समूची मानव जाति के परित्राण हेतु जीवनभर जागरूक रहें और सहस्राब्दियों के बाद आज भी अपनी प्रासंगिकता को प्रमाणित करते हुए स्थिर खड़े हैं।
दीपावली का स्वागत दीप जलाकर किया जा रहा है। महिलाएं घर की संपूर्ण स्वच्छता करके इस पर्व मनाने की सार्थकता मान लेती है। कहीं नए वस्त्र आभूषण आदि की खरीदी भी परम्परागत रूप से की जाती है। आतिशबाजी का प्रचलन भी इसी दिन के साथ प्रलम्ब काल से जुड़ा हुआ है। बड़े-बुजुर्ग मिठाईयां खरीद व बांटकर अपनी खुशी प्रकट कर देते हैं। दीवाली के बाह्य रूप विविध प्रकार के हैं। लौकिक और सामाजिक मूल्यवता से ऊपर उठकर अगर इस पर्व के आध्यात्मिक रूप को समझने का प्रयास किया जाए तो वह लौकिक पर्व अलौकिक शक्ति के जागरण का हेतुभूत बन सकता है।
आज मानव मन उद्धेलित है। ईर्ष्या, घृणा, भय का साम्राज्य निरंतर विस्तार पा रहा है। भाई-भाई का प्यार सिमटता चला जा रहा है और अलगाववाद सीना तानकर खड़े हैं। देश विभिन्न संकटों के दौर से गुजर रहा है। हिंसा का सुलगता हुआ दानावल संपूर्ण विश्व को लील जाने की तैयारी कर रहा है। भाईचारा दिखावा मात्र रह गया है। स्वार्थ के चश्मे ने सारे संबंधों को ताक पर रख दिया है। आदमी ने अपने चेहरे पर हजार मुखौटे लगा लिए हैं और बात पर विश्वास नहीं है। पारिवारिक, सामाजिक संबंधों की चरमराहट टूटन के कागार पर पहुंच गई है। अनुशासनहीनता और उदण्डता का खुला ताण्डव हो रहा है।
ये वार्तमानिक स्थितियां दीपावली पर्व मनाने वालों से प्रचण्ड घोष के साथ पूछ रही है, क्या यही था दीपावली का स्वरूप ! क्या यही है दीवाली मनाने की सार्थकता! वर्तमान के संदर्भ में दिशाहीन आदमी इस त्यौहार से नई दिशा प्राप्त कर अपने जीवन की दशा को बदल सकता है। बशर्ते मन में कुछ करने की ललक होनी चाहिए। आज व्यक्ति की दिशा ही मंजिल की तरफ नहीं है तो गाड़ी की रफ्तार बढ़ाने का अर्थ क्या होगा! सर्वप्रथम व्यक्ति लक्ष्य का निर्धारण करके गतिशील हो। अपने भीतर के स्वार्थ को दूर हटाकर परार्थ और परमार्थ से जोड़ने वाले दीप को जलाएं। किसी घर-परिवार को रोशन न कर सको तो कम से कम किसी की रोशनी बुझाने का प्रयास मत करो।
अपने भीतर के अज्ञान, मोह और आतंक के अंधेरे को दूर करने के लिए केवल माटी के नन्हें-नन्हें दीपों को जलाकर दीवाली मना लेना सार्थक नहीं होगा, जरूरत है अपने भीतर के दीए को प्रज्वलित करने की, स्नेह का तेल और अध्यात्म की बाती बनाने की। वचन की मधुरता मिठाई से भी हजार गुना अधिक मीठी है। इस तथ्य को समझकर जीवनगत करने की।
अपेक्षा है आओ, एक बार हम सभी अपने बैठकर स्वयं का अवलोकन करें, ज्ञानदीप जलाकर वैयक्तिक और सामूहिक कठिनाईयों और परेशानियों को दूर करने का प्रयास करें। अपने मन और इंद्रियों को संयम से संवारें। कर्म कचरे को साफ करके अखण्ड ज्योति वाले दीप को प्रज्वलित कर अंधकार से प्रकाश की तरफ बढ़ जाएं। जहां आनंद व सुख का वर्षण हो रहा है, जहां हर प्यास को तृप्ति मिलती है। जहां हर श्वास को विश्वास मिलता है। जहां हर विरुवे का विकास होता है।
आइए ! अंतर-दीप जलाकर ज्योति दीप दीपावली के मंगलमय अवसर पर ज्योतिर्मय बने।

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