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नागरिकता रजिस्टर की व्यावहारिकता

Last updated: November 22, 2019 7:18 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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अनुपमा रॉय।। 
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार करने की घोषणा कर दी है। शाह के अनुसार, यह रजिस्टर असम में भी तैयार किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि ‘असम सम्मिलिता महासंघ’ और ‘असम पब्लिक वर्क्स’ की याचिका के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के संरक्षण में तैयार हो रहा असम का एनआरसी रद्द हो जाएगा। यानी, पिछले चार वर्षों से करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हो रहा यह एनआरसी, जिसे तैयार करने की प्रक्रिया में तमाम संस्थागत और मानव संसाधन शामिल थे और जिसमें नाम न दर्ज हो पाने के कारण लाखों लोगों ने बेहद त्रासद अनुभव किया था, उन सबको अब भुला दिया जाएगा? एक सवाल यह भी हो सकता है कि एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया की जिन बहुत सी खामियों का अनुभव असम ने कराया है, क्या अब उन्हें एक सीमित क्षेत्र से आगे बढ़ाकर पूरे भारत में लागू किया जाएगा?
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का प्रावधान नागरिक संशोधन अधिनियम-2003 के तहत अस्तित्व में आया। इसी संशोधन द्वारा जन्मजात नागरिकता को सीमित कर दिया गया। संशोधन के बाद भारत में जन्म के आधार पर वही व्यक्ति नागरिक बन सकता है, जिसके माता-पिता, दोनों भारतीय हों और उनमें से कोई भी देश के अवैध नागरिक न हों। यह संशोधन तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार लेकर आई थी। मौजूदा समय में नागरिकता पर उठे विवाद को 2003 के इसी संविधान संशोधन और इससे जुड़े वैचारिक व राजनीतिक प्रवृत्तियों के मजबूत होने के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
यह उल्लेखनीय है कि असम में एनआरसी तैयार करने को लेकर नेताओं और लोगों में जो आम उत्साह था, वह एनआरसी की आखिरी सूची के आने तक काफी ढीला पड़ गया था। इसका प्रमुख कारण यह है कि उम्मीदों के विपरीत अनगिनत ऐसे लोग भी इस सूची से बाहर हो गए थे, जो इसमें होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे और भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाई ने भी इसकी प्रक्रिया पर असंतोष जताया था। इस संदर्भ में प्रस्तावित नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इस संशोधन के माध्यम से सरकार न केवल एनआरसी-प्रक्रिया से उभरी ऐसे लोगों की चिंताएं खत्म कर सकती है, बल्कि खुद को फिर से राष्ट्र व राज्य के संरक्षक के रूप में स्थापित कर सकती है।
यहां पर यह याद रखना चाहिए कि 2016 का नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) 2003 के संशोधन द्वारा जन्मजात नागरिक बनने की प्रक्रिया को बाधित किए जाने से अवैध होने वाले लोगों और उनके बच्चों को नागरिक बनने की सुविधा देता है। यह बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मजहबी प्रताड़ना की वजह से पलायन करके भारत आए छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) को अवैध प्रवासी होने के आरोप से मुक्त करता है। अवैध प्रवासियों की श्रेणी से कुछ धार्मिक समुदायों को छूट देकर सीएबी ने 2015 में सरकार द्वारा जारी कार्यकारी आदेशों और नियमों को कानूनी स्वरूप देने का प्रयास किया। 7 सितंबर, 2015 की गजट अधिसूचना ने पासपोर्ट अधिनियम व विदेशी अधिनियम में बदलाव करते हुए छूट के लिए अवैध प्रवासियों की पात्रता-तारीख 31 दिसंबर, 2014 कर दी। उल्लेखनीय है कि असम सम्मिलिता महासंघ द्वारा दायर याचिका में नागरिकता अधिनियम द्वारा राज्य के लिए निर्धारित तारीख 24 मार्च, 1971 को चुनौती दी गई थी, क्योंकि यह तिथि संविधान द्वारा निर्धारित तिथि 19 जुलाई, 1948 (जो देश के बाकी हिस्सों में लागू होती है) से भिन्न थी।
सीएबी 2016 पर विमर्श करने और संसद को सुझाव देने के लिए गठित संयुक्त संसदीय कमेटी ने इस साल की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की थी। इसमें कमेटी के नौ सदस्यों ने सीएबी से अपनी असहमति व्यक्त की है। संयुक्त संसदीय समिति की यह रिपोर्ट देश में नागरिकता की अवधारणा में आए वैचारिक बदलाव और उसके राजनीतिक आधार की अभिव्यक्ति है। कानूनी नागरिकता और रक्त-संबंधों के बीच सामंजस्य बनाते हुए कमेटी ‘राष्ट्रीय’ नागरिकता और ‘प्राकृतिक’ नागरिकता के समन्वय की सिफारिश करती है। इस रिपोर्ट को मानें, तो राष्ट्रीय नागरिकता रक्त संबंधों पर आधारित आत्मीयता की अभिव्यक्ति है।
यह नागरिकता एकजुटता और एकीकरण के मॉडल पर आधारित है, जो नागरिकों को सीमाबद्ध समूह जैसा मानती है। यह समूह मिल-जुलकर रहने के लिए प्रतिबद्ध है। संयुक्त संसदीय कमेटी सीएबी को सांविधानिक उल्लंघन, मुख्यत: अनुच्छेद-14 के उल्लंघन के आरोप से बचाने के लिए तर्क पेश करती है। ये सभी तर्क सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1952 में पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार मामले में सुनाए गए फैसले से जुड़े थे। संसदीय कमेटी को विश्वास था कि अनुच्छेद-14 के उल्लंघन की चुनौती का सामना इस आधार पर वह कर पाएगी कि समूहों के बीच भेदभाव असल में ‘तर्कसंगत’ व ‘व्यावहारिक’ हो। तर्कसंगतता और व्यावहारिकता इस आधार पर भी तय की जा सकती है कि कानून का लक्ष्य और ‘भेदभाव’ में सामंजस्य हो। हालांकि अनवर अली सरकार के मामले में शीर्ष अदालत ने दो शर्तें रखी थीं, जो अनुच्छेद-14 के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के लिए जरूरी थीं। इन दो शर्तों में से केवल एक ही भेदभाव की तार्किकता व व्यावहारिकता से संबंधित थी। दूसरी ज्यादा मूलभूत शर्त, जो ‘कानून के समक्ष समान संरक्षण’ की गारंटी से पैदा होती है, सभी व्यक्तियों का राज्य की विवेकहीन शक्ति से बचाव करती है।
इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में नाज फाउंडेशन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मामले में अपनी सोच जाहिर की थी। इसमें फैसला सुनाते हुए अदालत ने व्यावहारिकता की एक और शर्त रखी, जो कानून के उददेश्य को भी सांविधानिक निगरानी के दायरे में लाती है। यह निगरानी सांविधानिक नैतिकता पर आधारित होगी और सिर्फ अनुच्छेद-14 नहीं, बल्कि संविधान की प्रस्तावना और सिद्धांतों के मापदंडों पर भी खरा उतरेगी। सांविधानिक नैतिकता एक ऐसी महत्वपूर्ण नैतिकता है, जो बहुसंख्यकवादी राजनीति के विरुद्ध सांविधानिक लोकतंत्र के मानदंडों को मजबूत करती है।

Thanks:www.livehindustan.com

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