डोम्बिवली। यहां स्थित तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी शिष्या शासन श्री साध्वी श्री सोमलता जी ने विविध रंगी विशाल परिषद को संबोधित करते हुए कहा कि वाणी संयम का अभिप्राय केवल मौन नहीं है। इसका अर्थ है सोच-समझकर, तोल-मोल कर नपे तुले शब्द बोलना। क्योंकि शब्दों का मूल्य मोतियों से ज्यादा है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति हर क्षण हर पल मधुर बोले। मधुर वाणी में वह शक्ति होती है जो रिश्तों को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। चार प्रकार के मौन की चर्चा करते हुए आपने आत्मा के मौन को श्रेष्ठ बताया क्योंकि वह आत्म दर्शन के साक्षात्कार में योगभूत बनता है।
साध्वी श्री जी ने जन समुदाय की चेतना को झकझोरते हुए कहा- आज के दिन यह संकल्प करें कि हम द्रौपदी कि तरह नहीं, अनुपमा की तरह बोलें। श्रमण भगवान महावीर के जीवन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा- वासुदेव प्रतिवासुदेव आवेश के कारण नरक गति में जाते हैं। आवेश को शांत करने के लिए ज्योतिकेंद्र पर श्वेत रंग का ध्यान कर अनुप्रेक्षा करें।
प्राग्वक्तव्य में साध्वी श्री संचितयशा जी ने कहा- मौन से शक्ति संचित होती हैं। वाणी में बल एवं तेज भी जागृत होता है। साध्वी श्री रक्षितयशा जी ने कार्यक्रम का संचालन किया। साध्वी श्री शकुंतलाकुमारी जी व जागृतप्रभा जी ने ‘शांति रहेगी आठो याम’ गीत का संगान किया। नवयुवती मंडल ने महावीर स्तुति की।
मधुर वाणी रिश्तों को जोड़ती है तोड़ती नहीं: शासन श्री साध्वी श्री सोमलता जी

