बोईसर। स्वाध्याय की महत्ता बताते हुए उपासक श्री पारसमलजी दुग्गड़ ने कहा जो आत्मा को जानता है वह स्वाध्या कहलाता है। भगवान महावीर ने भी स्वाध्याय को ‘तप स्वाध्याय’ कहा है। स्वाध्याय से ज्ञानवर्धन होता है, जिससे धर्मं और संस्कृति की सेवा होती है । स्वयं का स्वयं द्वारा अध्यनन स्वाध्याय है। स्वाध्याय से ज्ञाना वर्णीय कर्म का नाश होता है और केवल्य ज्ञान होने का सौभग्य रहता है। मन की कलुषता को साफ करके आत्मा को परमात्मा के निकट बिठाने का उत्तम मार्ग है,स्वाध्याय। नियमित संकल्प पूर्वक सद्ग्रंथो का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । उन्होंने भगवान ऋषभदेव के जीवन क्रम की भी जानकारी दी। श्री विनोदजी बाफना ने स्वाध्याय पर जोर देते हुए सबको आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के साहित्यों का नियमित पाठ्य करने की प्रेरणा दी । जिससे प्रेरणा पाकर कई श्रावको ने प्रतिदिन 15-20 मिनट स्वाध्याय करने का संकल्प लिया। प्रवचन पश्चात तपस्या का पचाखण कराया ।

बोइसर में स्वाध्याय दिवस के रूप में पर्युषण पर्व के दूसरे दिन का आगमन

