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आत्म शुद्धि का साधन है धर्म: शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: August 22, 2019 8:17 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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-‘सम्बोधि’ प्रवचनमाला के अंतर्गत आचार्यश्री ने की धर्म और अधर्म की व्याख्या
-सदैव धर्म में रत रहने और समस्या के मूल को उन्मूलित करने का आचार्यश्री ने दिया ज्ञान
-विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक श्री दिनेशचंद्रजी ने आचार्यश्री के दर्शन कर पाया आशीर्वाद

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): जन-जन को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश देने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में बेंगलुरु के कुम्बलगोडु में स्थित आचार्यश्री तुलसी महाप्रज्ञ चेतना सेवाकेन्द्र में दक्षिण भारत का दूसरा चतुर्मास कर रहे हैं। चतुर्मासकाल की व्यापक प्रभावना का आंकलन इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित होते हैं, उनकी मंगलवाणी का श्रवण करते हैं, आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
गुरुवार को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शनार्थ विश्व हिन्दू परिषद के परामर्शक व मार्गदर्शक श्री दिनेशचंद्रजी तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री राघवल्लुजी उपस्थित हुए। आचार्यश्री के दर्शन के उपरान्त मंगल प्रवचन श्रवण के लिए ‘महाश्रमण समवसरण’ में भी पहुंचे। आचार्यश्री ने नित्य की भांति उपस्थित श्रद्धालुओं को ‘सम्बोधि’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अधर्म क्या होता है, अधर्म से क्या फल मिलता है, इसे जानने के लिए आदमी को पहले धर्म को जानने का प्रयास करना चाहिए। जिससे आत्मा की शुद्धि हो अथवा आत्मशुद्धि के साधन को धर्म कहा गया है। आदमी के जीवन में दो तत्त्वों की प्रधानता होती है-शरीर और आत्मा। शरीर तो प्रत्यक्ष है, किन्तु आत्मा परोक्ष तत्त्व है। इस दुनिया में दो प्रकार के पदार्थ बताए गए हैं-मूर्त और अमूर्त। मूर्त को आंखों से देखा जा सकता है, इसमें भी कुछ मूर्त इतने सूक्ष्म होते हैं कि उन्हें आंखों से देखा ही नहीं जा सकता, ऐसे में भला आदमी अमूर्त आत्मा को कैसे देख सकता है। आत्मा को आत्मा के द्वारा देखा जा सकता है। साधना के द्वारा आत्मा की अनुभूति की जा सकती है। आत्मा अमूर्त है। धर्म से आत्मा का शोधन होता है। अध्यात्म की साधना और धर्म के द्वारा आत्मा का शुद्धिकरण किया जाता है। जिस प्रकार मिट्टी से मिले स्वर्ण को प्रक्रिया के माध्यम से शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार अधर्म के कारण मलीन हुई आत्मा को धर्म और अध्यात्म की प्रक्रिया से शुद्ध किया जाता है। ‘सम्बोधि’ में बताया गया कि अधर्म के कारण नए-नए असत् तत्त्वों का विकास होता है। हिंसा, हत्या, चोरी, लूट, छल-कपट, झूठ यह सभी अधर्म हैं। इनके माध्यम से अशुभ कर्म आत्मा से बंधते हैं तो आत्मा मलीन हो जाती है। अधर्म बुरा फल प्रदान करने वाला होता है। आदमी को अधर्म से बचने के लिए उसके मूल पर ध्यान देना चाहिए। अधर्म के मूल में राग और द्वेष होते हैं। आदमी को मूल पर ध्यान देकर उसे उन्मूलित करने का प्रयास करना चाहिए ताकि जीवन से अधर्म का सर्वनाश हो सके। इसलिए आदमी को धर्म की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त उपस्थित गणमान्यों को अहिंसा यात्रा के विषय में अवगति प्रदान करते हुए पावन पथदर्शन प्रदान किया। अहिंसा यात्रा प्रवक्ता मुनि कुमारश्रमणजी का वक्तव्य हुआ।
इसके उपरान्त विश्व हिन्दू परिषद के परामर्शक व संरक्षक श्री दिनेशचंद्रजी ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि आचार्यश्री के प्रवचनों से हमें जीवन जीने की राह प्राप्त होती है। आचार्यश्री के आशीर्वाद रूपी ऊर्जा प्राप्त कर मानों जीवन धन्य हो जाता है। बेंगलुरु चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मूलचंद नाहर ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वीश्री सुषमाकुमारीजी ने तपस्या के संदर्भ में श्रद्धालुओं को उत्प्रेरित किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।

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