मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार में प्रवचन में ललितशेखरविजयजी म. सा. ने अमृत बिंदु ग्रंथ की भूमिका बताते हुए समझाया के क्रोध ४ तरह का होता हैं, १. तीव्र, शीघ्र और दीर्घ कालीन क्रोध, १ साल से अधिक क्रोध अनंतानुबंधी क्रोध होता हैं जो पहाड़ में रेखा खींचने जैसा होता हैं, आत्मा को धर्मी बनने नहीं देता हैं, अगर क्रोध में आत्मा आयुष्य बंध करें तो निश्चित नरक गति मिलती हैं। २. अप्रत्याखानी क्रोध जो देव, गुरु, धर्म, आदि समझने देता हैं पर आचरण में लेने नहीं देता हैं, धरती में बनी रेखा जैसा, तिर्यंच गति में ले जाता हैं। ३. प्रत्याखानी क्रोध जो व्रत, नियम, आदि स्वीकारने देता हैं पर दीक्षा लेने नहीं देता हैं, मिट्टी में बनी रेखा जैसा। ४. समज्वलन क्रोध जो साधु जीवन में होता हैं और देव गति का आयुष्य बंध करता हैं।
क्रोध में कभी निर्णय नहीं लेना चाहिए और अधिक आनंद में कभी वचन नहीं देना चाहिए। बारिश और बिजली जो दोनों आकाश से गिरते हैं, उनके उदाहरण से समझाया के बारिश सबको पसंद होती हैं और बिजली को सब नापसंद करते हैं क्योंकि बारिश ठंडक देती हैं और बिजली गर्मी, बारिश जब आती है तब हाश शब्द मुँह से निकलता हैं और बिजली के लिए हाय, बारिश वनस्पति को हरा भरा कर देती हैं और बिजली जला देती हैं। मुँह से निकले शब्द अगर मधुर, मीठे, कोमल, सरल, सत्य, हितकारी, आदि हैं तो बारिश के समान हैं और अगर कड़वे, कठोर, तीखें, झूठे, अहितकारी, आदि हैं तो बिजली के समान हैं। बिजली जहां गिरती हैं सिर्फ वहीं नुकसान करती हैं पर अप्रिय वाणी संबंध, समाधि, सद्गुण और समता का नुकसान करती हैं। व्यवहार में ४ प्रकार की वाणी बताई गई हैं, १. सत्य, २. असत्य, ३. सत्य-असत्य सहित (मिश्रित), ४. सत्य-असत्य रहित (ये करो, वो करो, आदि आदेश की भाषा)।
असत्य बोलने से समकित से हाथ धो बैठेंगे, दुर्बुद्धि, पाप की बुद्धि छोड़ेंगे तब श्रद्धा और समकित की प्राप्ति होगी। ३ प्रकार की बुद्धि बताई गई हैं, १. सामान्य बुद्धि, जो नसीब के भरोसे रहे और पुरुषार्थ ना करें, २. विशेष बुद्धि, जो पुरुषार्थ करे और नसीब बदलने का सोचे, ३. विचक्षण बुद्धि, जो समय आने पर क्या करना और क्या ना करना, क्या छोड़ना और क्या पकड़ना, आदि का ज्ञान वाली। जिसको लगता है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा बुद्धि है वो कभी समर्पित नहीं हो सकता और जिसको लगता है कि उसके पास ज़रूरत से कम धन है वो कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। कुंठित, कुपित, आदि वाली बुद्धि कुमति होती है और कर्तव्य, कल्याण, आदि वाली बुद्धि सुमति होती हैं।
किशन सिंघवी के अनुसार ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारियों में अध्यक्ष वसंत भंसाली, पूर्व अध्यक्ष चंदनमल संघवी, राजमल जैन, पंकज मेहता, रसिक पालरेचा, देवीलाल संघवी, देवराज पुनमिया, ललित जैन, बस्तिमल बाफना, आदि मौजूद रहे और समर्पण ग्रुप, ठाकुरद्वार के कुणाल शाह, अमित जैन, जुगल जैन, विशाल जैन, मनीष जैन, हितेश शाह, परेश दानी, रुषान जैन, भरत पोरवाल, आदि मौजूद रहे, वहीं अर्जुन नेनावती, हस्ती पामेचा, भेरुलाल सिंघवी, मांगीलाल पामेचा, शान्तिलाल पामेचा, प्रकाश सिंघवी, फुलचन्द लोढ़ा, गिरीश सिंघवी आदि भी मौजूद रहे ।
क्रोध में कभी निर्णय नहीं लेना चाहिए और अधिक आनंद में कभी वचन नहीं देना चाहिएः ललितशेखरविजयजी म. सा.

