मुंबई। आचार्य रविशेखर सुरिश्वर मासा: की निश्रा मे ठाकुरद्वारा में ललितशेखरविजयजी म. सा. ने आज प्रवचन में बताया के आध्यात्म जगत में कौन हमारी आत्मा का मित्र है और शत्रु है वो जानने का सबसे आसान तरीका है के जो हमारी आत्मा के लिए हितकारी है वो मित्र है और जो अहितकारी है वो शत्रु है । जो हमारी शांति, समाधि और सद्गति को सुरक्षित करें वो हमारी आत्मा का मित्र है और जो इन सबको असुरक्षित करें वो शत्रु है ।
पार्श्वनाथ भगवान के केसी गणधर और परदेसी राजा की कथा के माध्यम से बताया के परदेसी राजा जो नास्तिक था और उसको शरीर और आत्मा एक ही लगती थी जैसा इस दुनिया में आज कल बहुत से लोगों को भी यही लगता है, पर केसी गणधर ने अलग अलग उदाहरण देकर ये साबित किया के शरीर और आत्मा अलग अलग होती है ।
अंत में परदेसी राजा ने ये स्वीकार किया के शरीर और आत्मा अलग अलग होती है और आस्तिक बने । साथ साथ में ये भी बताया के आध्यात्मिक जगत या सांसारिक व्यवहारों में अगर आत्मा को केंद्र में रख के कार्य करने से आत्मा का कल्याण होता है और अलग अलग कथाओं के माध्यम से ये भी समझाया के आत्मा को केंद्र में रखकर की गई सांसारिक गतिविधियां जैसे शादी करते हुए, राज सिंहासन पे बैठे बैठे, दुकान पे धंधा करते हुए, इत्यादि लोगों को केवलज्ञान मिल चुका है ।
किशन सिंघवी ने बताया कि प्रवचन के पश्चात सेकड़ो गुरु भक्तो के सानिध्य मे ललितशेखरविजयजी म. सा. ने #भारत जैन महामंडल दक्षिण मुंबई शाखा द्वारा आयोजित #दिव्यांग संघ यात्रा के शुभ मुहूर्त के लिए पधारे पूर्व अध्यक्ष मांगीलाल मेहता, अध्यक्ष राकेश सोलंकी, सेक्रेटरी चंद्रकुमार भंसाली, डायरेक्टर भरत लालवानी, जितेंद्र चोपड़ा, चंदूलाल जैन आदि के हाथों में शुभ मुहूर्त प्रदान किया । इस मौके पे ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी महेंद्र मंडोत, पंकज मेहता, रसिक पालरेचा, देवीलाल संघवी खूबी लाल सिंघवी हस्ती सिंघवी चिराग सिंघवी चंदू पामेचा,कुणाल शहा आदि मौजूद रहे ।
ललितशेखरविजयजी म. सा. ने आत्मा के शत्रु-मित्र का मार्मिक वर्णन किया

