नयी दिल्ली। देश में महंगाई का असर अब आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखाई देने लगा है। रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी से परिवारों का घरेलू बजट बिगड़ रहा है। चीनी, चावल, गेहूं, दालें और खाद्य तेल जैसी बुनियादी जरूरतों की वस्तुओं के महंगे होने से मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। पहले से ही बिजली, गैस, पेट्रोल-डीजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते खर्च का सामना कर रहे लोगों के लिए खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर रही है।
महंगाई का सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ता है, जिनकी आय सीमित है और जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा भोजन तथा रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में खर्च हो जाता है। ऐसे में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी महीने के अंत तक बड़े आर्थिक बोझ में बदल जाती है।
खाद्य महंगाई में सबसे अधिक चर्चा चीनी की कीमतों को लेकर हो रही है। चीनी की कीमतों में पिछले कुछ महीनों के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केंद्र सरकार ने 21 अगस्त 2026 को जारी जानकारी में बताया था कि चीनी का औसत भाव 20 जुलाई को 48.18 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 20 अगस्त को 55.70 रुपये प्रति किलो हो गया था। सरकार ने इसकी वजह घरेलू उत्पादन में कमी, गन्ने की फसल को मौसम से नुकसान, त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति की स्थिति को बताया था।
चावल और गेहूं आम भारतीय परिवारों के भोजन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनकी कीमतों में बढ़ोतरी सीधे आम आदमी की जेब पर असर डालती है। भारतीय रिजर्व बैंक के अक्टूबर 2026 के बुलेटिन के अनुसार, अक्टूबर के शुरुआती दिनों में चावल और गेहूं की कीमतों में क्रमिक वृद्धि जारी रही। कमजोर मानसून और खरीफ फसल की बुवाई प्रभावित होने से कृषि उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसके अलावा कुछ विशेष किस्मों के चावल और गेहूं की उपलब्धता तथा बाजार में मांग के बीच असंतुलन भी कीमतों को प्रभावित कर रहा है।
भारतीय भोजन में दालों का विशेष महत्व है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए दाल प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत है। अरहर, मूंग, उड़द, मसूर और चना दाल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण परिवारों का मासिक खर्च बढ़ रहा है।
खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत तक पहुंची
महंगाई के मौजूदा दबाव को आंकड़े भी दर्शाते हैं। सितंबर 2026 में देश की खाद्य महंगाई दर बढ़कर 7.74 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि अगस्त में यह 5.97 प्रतिशत थी। वहीं सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54 प्रतिशत रही। रॉयटर्स की 6 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण में अक्टूबर की खुदरा महंगाई दर 5.93 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। खाद्य महंगाई बढ़ने के पीछे कमजोर मानसून और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में आई चुनौतियों को प्रमुख कारण बताया गया।
आम आदमी के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बजट
महंगाई का असर केवल बाजार में सामान खरीदने तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवारों की पूरी आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है। जिन परिवारों की मासिक आय निश्चित है, उनके लिए लगातार बढ़ती कीमतों के बीच घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है। एक तरफ बच्चों की शिक्षा, मकान का किराया, बिजली, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ रसोई का बजट भी लगातार दबाव में है। कई परिवारों को अब अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है। कुछ लोग महंगे खाद्य पदार्थों की खरीद कम कर रहे हैं तो कुछ परिवार दाल, तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की खपत में बदलाव करने को मजबूर हैं।
सरकार के सामने महंगाई पर नियंत्रण की चुनौती
खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित रखना केंद्र और राज्य सरकारों के सामने बड़ी चुनौती है। सरकार को बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने, जमाखोरी और कालाबाजारी पर निगरानी रखने तथा किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो आने वाले महीनों में भी महंगाई का दबाव जारी रह सकता है।
देश में महंगाई बेकाबू, एक सप्ताह में 121 रुपये महंगी चीनी, चावल, गेहूं, दालों, खाद्य तेलों में जबरदस्त तेजी

