नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर हुए CJP के छात्र प्रदर्शन में शामिल होने वाले गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही CJP प्रदर्शन से जुड़े छात्रों के खिलाफ दंडात्मक या जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस कैसे जारी कर दिया।
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से 4 सितंबर को नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में कथित तौर पर उन पर छात्रों को CJP के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने और ऐसी जानकारी प्रसारित करने का आरोप लगाया गया, जिससे सार्वजनिक शांति एवं कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बताई गई।
छात्र से 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और समान राशि के दो जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया था। यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की निवारक धाराओं के तहत की गई थी।
अक्षत त्रिपाठी ने इस नोटिस को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि यह उनके मौलिक अधिकारों-अनुच्छेद 14, 19 और 21-का उल्लंघन है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश के विपरीत है, जिसमें CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के मामले में दर्ज FIR को रद्द करते हुए छात्रों के खिलाफ आगे किसी तरह की जबरन कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।
मामला बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत भट्टाचार्य द्वारा मौखिक रूप से मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष उठाया गया। पीठ ने इस बात पर गंभीर सवाल किया कि पहले से मौजूद सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद स्थानीय प्रशासन ने छात्र को नोटिस क्यों जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के प्रशासन/संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगने की बात कही है। अदालत की नाराजगी का मुख्य आधार यह था कि न्यायालय द्वारा छात्रों को संरक्षण दिए जाने के बाद भी उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई शुरू की गई। सुनवाई के दौरान छात्र की ओर से बताया गया कि प्रशासन ने नोटिस बाद में वापस ले लिया है। हालांकि, नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि जब अदालत का आदेश पहले से मौजूद था, तो उसके बाद ऐसी कार्रवाई की आवश्यकता ही क्यों पड़ी।
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