सोने का धंधा करने वालों को सोने का नशा है, मेटल वालों को मेटल का, केमिकल वालों को केमिकल का, बीमा वालों को इंश्योरेंस का और शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने वालों को मार्केट का नशा है-क्या यह सच नहीं है? और जो लोग वास्तव में पैसा बनाते हैं, उन्हें वेल्थ क्रिएशन का नशा होता है। लेकिन एक सीधा सवाल-क्या यह नशा सही दिशा में है या सिर्फ आदत बन चुका है?
क्या आपने कभी खुद से पूछा है कि आप यह नशा क्यों पाल रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण-इस नशे की कोई तय कीमत है या नहीं? क्या आपने अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित किया है-पाँच करोड़, पचास करोड़, पाँच सौ करोड़ या पाँच हज़ार करोड़? या फिर आप बस काम करते जा रहे हैं, बिना यह जाने कि आखिर पहुँचना कहाँ है?
अगर लक्ष्य तय नहीं है, तो क्या आप कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल नहीं घूम रहे? क्या यह संभव नहीं कि आप पूरी जिंदगी मेहनत करते रहें, लेकिन मंजिल का पता ही न हो? और अगर मंजिल ही नहीं पता, तो वहाँ पहुँचकर भी क्या आप संतुष्ट हो पाएंगे, या फिर एक नई दौड़ शुरू कर देंगे?
तो फिर असली सवाल यह है-क्या केवल धंधे का नशा काफी है, या उसके साथ एक स्पष्ट दिशा और लक्ष्य भी जरूरी है? क्या आपने कभी यह सोचा कि आपके पास कितना होना चाहिए, और कब रुकना है? या फिर यह दौड़ अनंत चलती रहेगी?
यहीं पर भगवान महावीर का अपरिग्रह और धारणा का सिद्धांत हमें रास्ता दिखाता है। क्या आपने कभी इस पर विचार किया है कि जब आप एक सीमा तय करते हैं—एक स्पष्ट धारणा बनाते हैं—तो वही आपकी ऊर्जा को केंद्रित कर देता है? क्या यह सच नहीं कि बिना धारणा के प्रयास बिखरे हुए होते हैं, और धारणा के साथ वही प्रयास परिणाम देने लगते हैं?
अगर आप अपनी धारणा तय कर ले-चाहे वह पाँच करोड़ हो या पाँच हज़ार करोड़—तो क्या आपकी सोच, आपके निर्णय और आपकी रणनीति अपने आप नहीं बदल जाएगी? क्या तब यूनिवर्स (सृष्टि) भी उसी दिशा में आपका साथ नहीं देगा?
अंत में खुद से एक सवाल पूछिए, क्या आप सिर्फ नशे में काम कर रहे हैं, या एक तय लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं?
क्योंकि सच्चाई यही है। धंधे का नशा आपको व्यस्त रखता है, लेकिन स्पष्ट लक्ष्य ही आपको धनवान बनाता है।
धंधे का नशा या लक्ष्य की दिशा?

