नई दिल्ली। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप कक्षा 9 की नई संस्कृत पाठ्यपुस्तक शारदा में शामिल “णमो अरिहंताणं” पाठ को लेकर विभिन्न माध्यमों में भिन्न-भिन्न दावे सामने आ रहे हैं। कुछ स्थानों पर इसे “नवकार महामंत्र” को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह प्रस्तुति पूर्णतः सटीक नहीं है।
जानकारी के अनुसार नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) द्वारा इस पाठ को विद्यार्थियों को प्राकृत-पाली भाषा की मूल समझ से परिचित कराने के उद्देश्य से जोड़ा गया है। “णमो अरिहंताणं” जैन परंपरा के ‘नमोकार मंत्र’ का प्रथम अंश है, न कि संपूर्ण मंत्र। ऐसे में इसे पूरे मंत्र के रूप में प्रस्तुत करना आंशिक जानकारी को पूर्ण तथ्य के रूप में दर्शाने जैसा माना जा रहा है।
भाषाविदों का कहना है कि जिस मंत्र को सामान्यतः “नवकार मंत्र” कहा जाता है, उसका पाली-प्राकृत भाषा में शास्त्रीय नाम “णमोकार मंत्र” और हिंदी में “नमोकार मंत्र” है, जिसका अर्थ ‘नमन करने वाला मंत्र’ होता है। इस संदर्भ में शब्दों की शुद्धता और उनके मूल रूप को समझना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि उसके भावार्थ को। इसी बीच कुछ मंचों पर इसे 9 अप्रैल को मनाए गए “विश्व नवकार मंत्र दिवस” से जोड़कर भी देखा जा रहा है, हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि शैक्षणिक सामग्री को उसके मूल उद्देश्य—भाषाई और सांस्कृतिक अध्ययन-के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना चाहिए।
शिक्षा जगत के जानकारों के अनुसार किसी भी पाठ्य सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर या संदर्भ से हटकर प्रस्तुत करना विद्यार्थियों और समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि तथ्य आधारित और संतुलित जानकारी को ही प्राथमिकता दी जाए, ताकि शिक्षा की विश्वसनीयता बनी रहे।
”णमो अरिहंताणं” पाठ को लेकर भ्रम, भाषाई संदर्भ को ‘नवकार मंत्र’ बताने पर उठे सवाल

