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Reading: जसलोक हॉस्पिटल ने मेनिस्कस ट्रांसप्लांट में रचा इतिहास
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Mumbai / Maharshtra

जसलोक हॉस्पिटल ने मेनिस्कस ट्रांसप्लांट में रचा इतिहास

Last updated: March 31, 2026 1:05 am
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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Highlights
  • युवा मरीज के घुटने को मिली नई ताकत; विदेशी निर्भरता खत्म-अब खर्च होगा कम

मुंबई।  घुटने के संरक्षण की सर्जरी में भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने एक ही संस्थान के भीतर दान किए गए, प्रोसेस किए गए और प्रत्यारोपित किए गए ग्राफ्ट का उपयोग कर सफलतापूर्वक मेनिस्कस एलोग्राफ्ट ट्रांसप्लांट किया है। डॉ. प्रसाद भगुंडे, कंसल्‍टेंट ऑर्थोपेडिक्‍स एवं स्‍पोर्ट्स मेडिसिन एक्‍सपर्ट के नेतृत्व वाली सर्जिकल टीम द्वारा की गई यह प्रक्रिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। सर्जरी के लिए एनेस्‍थीसिया में डॉ रजनी एम आर, कंसल्‍टेंट एनेस्‍थेसियोलॉजी, जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर का सहयोग मिला। यह साबित करता है कि अब हमारे देश के संस्थान टिश्यू डोनेशन (ऊतक दान), संरक्षण और ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया को खुद मैनेज करने में सक्षम हैं।
जसलोक हॉस्पिटल में यह सर्जरी एक 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र पर की गई, जो खेल के दौरान लगी चोट के कारण अपना मेनिस्कस खो चुका था। इससे पहले कई बार इलाज कराने के बावजूद उसका दर्द कम नहीं हो रहा था, जिससे उसके घुटने का स्वास्थ्य और चलना-फिरना मुश्किल हो गया था। यह छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए पार्ट-टाइम खिलाड़ी के रूप में भी काम करता था। समय के साथ स्थिति इतनी खराब हो गई कि जसलोक अस्पताल पहुँचने से पहले उसका सामान्य चलना भी दूभर हो गया था। मेनिस्कस घुटने के जोड़ में एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ (झटका सहने वाली गद्दी) की तरह काम करता है। जब चोट या बार-बार की सर्जरी के कारण यह पूरी तरह हट जाता है, तो मरीजों को लगातार दर्द, सूजन और कम उम्र में ही घुटने के गठिया का खतरा हो जाता है। युवाओं और सक्रिय लोगों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर होती है क्योंकि इसके बिना उनका हिलना-डुलना मुश्किल हो जाता है।
एक बार पूरी तरह नष्ट होने के बाद मेनिस्कस खुद से दोबारा नहीं बनता, और फिलहाल कोई ऐसा बनावटी इम्प्लांट नहीं है जो इसकी प्राकृतिक कार्यप्रणाली की बराबरी कर सके। ऐसे मरीजों के लिए, जिन्हें अभी गंभीर गठिया नहीं हुआ है, डोनर के जैविक ऊतक का ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता है जो घुटने को फिर से सामान्य बना सकता है। इस मामले में, मेनिस्कस ग्राफ्ट (गद्दी) जसलोक अस्पताल में ही दान की गई थी और बाद में उसी अस्पताल के एक मरीज में ट्रांसप्लांट की गई। स्थानीय स्तर पर दान और ट्रांसप्लांट का ऐसा पूरा चक्र अभी भी भारत में आम नहीं है। यह दिखाता है कि देश के भीतर ‘टिश्यू डोनेशन’ (ऊतक दान) उन मरीजों की सीधी मदद कैसे कर सकता है, जिन्हें घुटने बचाने वाली जटिल सर्जरी की ज़रूरत होती है। इसी डोनर ग्राफ्ट का उपयोग करके जसलोक अस्पताल के सर्जन्स ने न्यूनतम इनवेसिव (बिना बड़े चीरे के) आर्थ्रोस्कोपिक तरीके से ट्रांसप्लांट पूरा किया। घुटने में प्राकृतिक कुशनिंग और मजबूती वापस लाने के लिए सही साइज़ की मेनिस्कस गद्दी लगाई गई, ताकि मरीज का घुटना फिर से सामान्य रूप से काम कर सके और वह पहले की तरह चल-फिर सके।
सर्जरी के बारे में बताते हुए डॉ. प्रसाद भगुंडे, कंसल्‍टेंट ऑर्थोपेडिक्‍स एवं स्‍पोर्ट्स मेडिसिन एक्‍सपर्ट, जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने कहा, “मेनिस्कस ट्रांसप्लांट में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि लगाई गई गद्दी मरीज के अपने असली ऊतकों की तरह काम करे। अगर इसके साइज़ या जगह में ज़रा सा भी फर्क रह जाए, तो चलते-फिरते घुटने पर शरीर का भार बराबर नहीं बँटता। इस केस में हमने ग्राफ्ट को मरीज के घुटने से मैच करने और उसे सही जगह पर लगाने की प्लानिंग पर काफी समय दिया, ताकि घुटने को उसकी पुरानी कुशनिंग और मज़बूती वापस मिल सके। एक युवा और एक्टिव मरीज के लिए यह बेहद ज़रूरी है।” विदेशी निर्भरता कम और खर्च में भारी बचत पहले, ऐसी सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले मेनिस्कस ग्राफ्ट्स ज़्यादातर अमेरिका से मंगाए जाते थे। इसमें अक्सर साइज़ के तालमेल की समस्या आती थी, क्योंकि भारतीयों के घुटनों की बनावट (एनाटमी) आमतौर पर अमेरिकी लोगों की तुलना में छोटी होती है। इसके अलावा लागत भी एक बड़ी रुकावट थी-आयातित ग्राफ्ट्स की कीमत करीब 14 लाख रुपये होती थी, जिससे यह इलाज आम मरीजों की पहुँच से बाहर था। लेकिन अब स्थानीय स्तर पर तैयार ग्राफ्ट्स ने तस्वीर बदल दी है। ये अब मात्र 1.5 लाख रुपये में उपलब्ध हैं, जिससे वित्तीय बोझ काफी कम हो गया है। साथ ही, ये भारतीय मरीजों के शरीर की बनावट के लिए ज़्यादा बेहतर साबित हो रहे हैं। जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डायरेक्‍टर – मेडिकल सर्विसेज डॉ. मिलिंद खड़के ने कहा , “कई सालों तक भारत में ऐसे बायोलॉजिकल ग्राफ्ट्स पर आधारित इलाज बड़े पैमाने पर करना मुश्किल था, क्योंकि टिश्यू डोनेशन और संरक्षण का सिस्टम अभी विकसित हो रहा था।
यह केस इस बात का संकेत है कि अब वह कमी पूरी हो रही है। जब अस्पताल पूरी प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर संभालने में सक्षम हो जाते हैं, तो इलाज की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। असली सफलता विदेशी समाधानों पर निर्भर रहने के बजाय देश के भीतर ही ऐसी क्षमता बनाने में है।” यह मामला भारत में आधुनिक ऑर्थोपेडिक केयर को बढ़ाने में ‘टिश्यू डोनेशन’ की अहम भूमिका को भी उजागर करता है। डोनर की सहमति से लेकर ऊतक निकालने, उसे प्रोसेस करने, स्टेरिलाइज़ करने, स्टोर करने और अंत में सर्जरी करने तक की पूरी कड़ी भारत में ही पूरी की गई। यह दिखाता है कि कैसे एक मज़बूत घरेलू व्यवस्था भारत में घुटने बचाने वाली जटिल प्रक्रियाओं को मुमकिन बना सकती है।

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