सुरभि सलोनीसुरभि सलोनीसुरभि सलोनी
  • National
  • State
  • Social
  • Entertainment
  • Mumbai / Maharashtra
  • Video
  • E-Magazine
Reading: समस्या की अनदेखी करते समाधान
Share
Font ResizerAa
सुरभि सलोनीसुरभि सलोनी
Font ResizerAa
  • National
  • State
  • Social
  • Entertainment
  • Mumbai / Maharashtra
  • Video
  • E-Magazine
Search
  • Business
  • entertainment
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
© 2022 Surabhi Sloni All Rights Reserved.
Articles

समस्या की अनदेखी करते समाधान

Last updated: December 24, 2018 10:03 am
Surabhi Saloni
Share
7 Min Read
प्रतीकात्मक तस्वीर
SHARE

हिमांशु।। 
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत ने कृषि संकट को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इस चुनावी जीत के निश्चय ही कई कारक थे, लेकिन खेतिहरों की दुश्वारियां इन सबमें प्रमुख थीं। यह माना जाता है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी कृषि संकट को लेकर उदासीन रही है, बल्कि कुछ हद तक उसने इसे बढ़ाया ही है, लेकिन वास्तव में इस संकट का कोई आसान उपाय दिखता भी नहीं। यहां तक कि जीत हासिल करने वाली कांग्रेस ने भी किसानों का भरोसा जीतने के लिए कर्जमाफी के पुराने फॉर्मूले और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी जैसे वादों पर भरोसा किया।
ये दोनों नुस्खे पुराने हैं और हर पार्टी द्वारा आजमाए जा चुके हैं। यहां तक कि भाजपा भी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों और अन्य जगहों पर यह दांव खेल चुकी है। मगर क्या सिर्फ कर्जमाफी और एमएसपी में वृद्धि कृषि संकट पर निर्णायक चोट कर सकती है? और क्या केवल इन्हीं के बूते दीर्घकालिक समाधान संभव है?  बिल्कुल नहीं। ये न सिर्फ आधे-अधूरे कदम हैं और असल समस्याओं के समाधान नहीं सुझाते, बल्कि हताशा का एक माहौल भी बनाते हैं, जो कृषि के पुनर्जीवन की संभावनाओं के खिलाफ है। इन सबसे संस्थागत बकायेदारों और बड़ी जोत के किसानों को बेजा फायदा मिलता है, और राज्यों एवं केंद्र के वित्तीय संसाधन काफी ज्यादा खर्च हो जाते हैं। कृषि में निवेश में कमी तो आती ही है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी कृषि निवेश घट रहा है, और ऐसा उन तमाम राज्यों में भी हो रहा है, जहां की सरकारों ने किसानों को कृषि-कर्ज चुकाने से राहत दी है।
ये कदम हमें उन मूल मुद्दों से भी भटकाते हैं, जो  कृषि-संकट के कारण हैं। कर्ज का जाल असल में इस बात का संकेत है कि कृषि आय में भयंकर गिरावट आई है। किसानों की आमदनी इसलिए कम हुई है, क्योंकि बढ़ी लागत के अनुपात में उन्हें फसल के दाम नहीं मिल रहे। ऐसा सिर्फ खाद्यान्न फसलों में नहीं, गैर-खाद्यान्न उपज के साथ भी हो रहा है। पिछले चार वर्षों में कृषि को लेकर व्यापार-शर्तों में जो तब्दीली की गई, उसने हाल के वर्षों में स्थिति बिगाड़ी ही है। हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि पिछले पांच महीनों से थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) में कुल खाद्य मुद्रास्फीति नकारात्मक बनी हुई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों से कीमतों में गिरावट जैसे सवालों की गंभीरता कम हो जाती है, क्योंकि किसानों के लिए फसल की कीमतें मायने रखती हैं, जो कि थोक मूल्यों से भी कम हैं।
बुनियादी सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई प्रवृत्ति दिखाई न देने के बावजूद आखिर कृषि मूल्य क्यों गिर रहे हैं? तर्क दिए जा रहे हैं कि हद से अधिक उत्पादन के कारण कीमतें गिरती हैं। मगर यह इतना सरल नहीं है, और उस देश के लिए तो बिल्कुल ही निंदनीय है, जहां भुखमरी और कुपोषण अब भी सुर्खियों में रहते हैं। बेशक इसके लिए अनावश्यक आयात, बाजार पर प्रतिबंध और कुछ उत्पादों की हद से अधिक आपूर्ति जैसे कई कारक भी जिम्मेदार हैं, लेकिन यह अर्थव्यवस्था, खासतौर से ग्रामीण आर्थिकी में मांग में आई गंभीर गिरावट का नतीजा भी है।
कृषि उत्पादों की कम कीमतों का एक कड़वा सच वह राजनीतिक अर्थशास्त्र भी है, जो अन्य तमाम उत्पादों की कीमतों के कम बढ़ने पर जोर देती है। और ऐसा खाद्य कीमतों को कम करके हासिल किया जाता है, क्योंकि इसे महंगाई बढ़ने का एक प्रमुख कारण माना  जाता है। हालांकि तथ्य यही है कि खाद्य मुद्रास्फीति और मूल महंगाई दर के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह हाल के महीनों में दिखा भी है, जब दोनों की राह अलग-अलग थी।
फिर भी, कम खाद्य महंगाई दर और इस वजह से समग्र मुद्रास्फीति एक ऐसा मसला है, जिस पर रेटिंग एजेंसियों और विदेशी संस्थागत निवेशकों का जोर रहता है, क्योंकि विकासशील मुल्कों में वे अपनी संपत्तियों के वास्तविक मूल्य बनाए रखने की कोशिशों में लगे रहते हैं। इसमें यदि थोड़ा सा भी भटकाव होता है, तो उसका नतीजा रेटिंग के कम होने और राजकोषीय घाटे के डर के रूप में दिखता है।
लेकिन इन सबसे किसानों की कमर जरूर टूटती है, और ऐसा मध्य वर्ग और वित्तीय संस्थानों को सब्सिडी देकर किया जाता है। कृषि में कम कीमत की समस्या एक व्यापक राजनीतिक-आर्थिक ढांचे का हिस्सा है, जो कृषि को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखता है, जिसका सौदा किया जा सके। यह महंगाई कम करने वाली नीतियों का ही एक हिस्सा है, जिसे 1990 के दशक के बाद से तमाम सरकारें अमल में लाती रही हैं। इस तरह की नीतियों से सरकारी खर्च में भी कमी आती है, जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में औसत वृद्धि से बेहतर होने के बावजूद देश रोजगार संकट से जूझता है।
जाहिर है, ग्रामीण क्षेत्र गहरे संकट में है, जहां मांग अपने सबसे निचले स्तर पर है। वास्तविक मजदूरी में भी गिरावट जारी है। बढ़ती लागत और फसलों की कम कीमत के कारण किसानों की आमदनी घटी है। नोटबंदी और जीएसटी ने भी कामगारों को नौकरी देने और मांग पैदा करने की असंगठित क्षेत्र की क्षमता को प्रभावित किया है। नतीजतन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक आभासी गतिरोध पैदा हो गया है। और यह सब तब हुआ है, जब कृषि उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है और विकास दर बढ़ रही है। इसका अर्थ यही है कि समस्या मूल रूप से आर्थिक विकास के उस मॉडल में है, जिस पर देश चल रहा है। साफ है, जब तक सरकारों को इसका एहसास नहीं होगा कि मौजूदा संकट दोषपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक ढांचे का ही नतीजा है, तब तक कृषि संकट के दूर होने की कोई संभावना नहीं है।(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Thanks:www.livehindustan.com

Sign Up For Daily Newsletter

Be keep up! Get the latest breaking news delivered straight to your inbox.

By signing up, you agree to our Terms of Use and acknowledge the data practices in our Privacy Policy. You may unsubscribe at any time.
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Copy Link Print
Share
What do you think?
Love0
Sad0
Happy0
Sleepy0
Angry0
Dead0
Wink0
Previous Article क्रिसमस ट्री से जुड़ी ये रोचक बातें
Next Article राहुल गांधी का कड़ा संदेश, अब कांग्रेस पार्टी के ऐसे नेताओं को नहीं किया जाएगा बर्दाश्‍त

आज का AQI

Live Cricket Scores

Latest News

पत्रकार को पेट्रोल पंप से थाने ले जाने पर गरमाया मामला, तीन पुलिसकर्मियों पर आरोप; सोमवार को मिलेगा प्रतिनिधिमंडल
state
September 13, 2026
उपनिरीक्षक दलसिंगार का इलाज के दौरान निधन, पुलिस महकमे में शोक की लहर
state
September 13, 2026
गन्ने के खेत से निकली नीलगाय ने पूर्व प्रधान पर किया हमला, मौके पर मौत
state
September 13, 2026
पालघर में अणुव्रत समिति ने मनाया ‘व्रत चेतना दिवस
social
September 13, 2026

Sign Up for Our Newsletter

Subscribe to our newsletter to get our newest articles instantly!

Follow US
© 2026 Surabhi Saloni All Rights Reserved. Disgen by AjayGupta
  • About Us
  • Privacy
  • Disclaimer
  • Terms and Conditions
  • Contact
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?