राजकुमार गौतम/बस्ती (यूपी)। 42 डिग्री सेल्सियस की चिलचिलाती धूप में जंगली जानवरों का मैदानी क्षेत्र में आना आम बात हो गया है। पानी की तलाश में जहां हिरन, चितग, बनैला जैसे जीव मैदानी क्षेत्र में आ गए हैं, वहीं इन जानवरों पर संकट भी बढ़ गया है आए दिन कुत्तों के द्वारा हिरण घायल देखने को मिल जाते हैं अभी कल की ही बात है भीटा ग्राम पंचायत में एक हिरण को कुत्तों ने घायल कर दिया जिसकी सूचना ग्रामीणों ने हंड्रेड डायल को दिया कार्रवाई करते हुए 100 नंबर के सिपाहियों ने वन विभाग को सूचित किया तत्परता दिखाते हुए वन विभाग के वनरक्षक अमरनाथ सिंह मौके पर पहुंच गए किरण को घायल देखकर अमरनाथ ने उसकी दवा करवाई व वन विहार मे छोड़ने का निर्णय लिया गया, पिकअप पर ले जाते हुए रास्ते में ही हिरण ने दम तोड़ दिया जिसको बन बिहार में दफना दिया गया ऐसी ही एक घटना ग्राम पढ़नी में भी हुई जिसमें कुत्तों के द्वारा काटे जाने पर एक हिरण की मौके पर ही मौत हो गई हिरण को ग्राम प्रधान और लोगों की देखरेख में गांव में ही दफन कर दिया गया।
वन्य जीव संरक्षण के बारे में अमरनाथ से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वन्यजीवों में ऐसे वनस्पति और जीव (पौधें, जानवर और सूक्ष्मजीव) शामिल हैं, जिनका मनुष्यों के द्वारा पालन-पोषण नहीं होता हैं. दूसरी ओर वन्य जीवों, वनस्पतियों और उनके आवासों की सुरक्षा करना ही संरक्षण है. इसलिए, हम कह सकते हैं कि प्रकृति और अन्य वन्यजीवों की प्रजातियों के महत्व को पहचानने के लिए वन्यजीवों का संरक्षण आवश्यक है.लुप्तप्राय पौधें और जानवरों की प्रजातियों को उनके प्राकृतिक निवासस्थान के अंतर्गत सुरक्षा प्रदान करने के लिए वन्यजीवों का संरक्षण महत्वपूर्ण है. सबसे प्रमुख चिंता का विषय यह है कि वन्यजीवों के निवासस्थान की सुरक्षा किस प्रकार की जाए ताकि भविष्य में वन्यजीवों की पीढ़ियां और यहां तक की इंसान भी इसका आनंद ले सकें. यह लेख वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आवश्यक चरणों से संबंधित है.
वनरक्षक अमरनाथ से जब एक प्रश्न में पूछा गया कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम क्या है? तब उन्होंने बताया कि भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972भारत सरकार ने सन् 1972 ई॰ में इस उद्देश्य से पारित किया था कि वन्यजीवों के अवैध शिकार तथा उसके हाड़-माँस और खाल के व्यापार पर रोक लगाई जा सके। इसे सन् 2003 ई॰ में संशोधित किया गया है और इसका नाम भारतीय वन्य जीव संरक्षण (संशोधित) अधिनियम 2002 रखा गया जिसके तहत इसमें दण्ड तथा जुर्माना और कठोर कर दिया गया है। 1972 से पहले, भारत के पास केवल पाँच नामित राष्ट्रीय पार्क थे। अन्य सुधारों के अलावा, अधिनियम संरक्षित पौधे और पशु प्रजातियों के अनुसूचियों की स्थापना तथा इन प्रजातियों की कटाई व शिकार को मोटे तौर पर गैरकानूनी करता है।
यह अधिनियम जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों को संरक्षण प्रदान करता है। यह जम्मू और कश्मीर जिसका अपना ही वन्यजीव क़ानून है को छोड़कर पूरे भारत में लागू होता है।
इसमें कुल 6 अनुसूचियाँ है जो अलग-अलग तरह से वन्यजीवन को सुरक्षा प्रदान करता है।
अनुसूची-1 तथा अनुसूची-2 के द्वितीय भाग वन्यजीवन को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते है| इनके तहत अपराधों के लिए उच्चतम दंड निर्धारित है।
अनुसूची-3 और अनुसूची-4 भी संरक्षण प्रदान कर रहे हैं लेकिन इनमे दंड बहुत कम हैं।
अनुसूची-5 मे वह जानवर शामिल है जिनका शिकार हो सकता है। जैसे नीलगाय बनैला आदि
छठी अनुसूची में शामिल पौधों की खेती और रोपण पर रोक है। (छठी अनुसूची में उत्तर प्रदेश सरकार ने संशोधन करके किसानों के हित के लिए पौधों की व्यावसायिक खेती की छूट दी है)
42 डिग्री तापमान में पानी खोजने जंगली जानवर कर रहे गांव का रुख, हो रही है मौत

