बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में आचार्य श्री पार्श्वचन्द्रजी म.सा. के सान्निध्य में सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप में आयोजित प्रात:कालीन क्लास में डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने श्रावक के 12 व्रतों की महत्ता बताते हुए कहा कि व्रत किसी पर थोपा हुआ नियम नहीं, बल्कि स्वेच्छा से स्वीकार किया गया आत्मसंयम का संकल्प है। पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत के माध्यम से श्रावक स्वयं को अनुशासित करता है, नए कर्मों के बंध को रोकता है तथा पुराने कर्मों की निर्जरा की दिशा में आगे बढ़ता है। अहिंसा, सत्य और अचौर्य जैसे व्रतों को वर्तमान जीवन में उतारना आवश्यक है।तीसरे व्रत को समझाते हुए डॉ.मुनि श्री ने कहा कि चोरी केवल किसी वस्तु को चुराना नहीं, बल्कि मिलावट, धोखाधड़ी, डिजिटल ठगी, बैंक खाते या पासवर्ड से संबंधित अनैतिक कृत्य भी अचौर्य व्रत की भावना के विरुद्ध हैं। व्रत का उद्देश्य केवल संकल्प लेना नहीं, बल्कि उसके भाव को समझकर व्यापार, व्यवहार और जीवन में ईमानदारी, संयम एवं शुद्धता अपनाना है।
जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य के पास बाहरी आंखें यानी चर्मचक्षु हैं, लेकिन सही-गलत का निर्णय करने के लिए अंतर्चक्षु यानी विवेक के नेत्र जागृत होना जरूरी है। लोभ ऐसा अंधापन है, जो धीरे-धीरे मनुष्य के विवेक और सद्गुणों को ढक देता है। अप्राप्त को पाने की तीव्र इच्छा और प्राप्त वस्तुओं के निरंतर संग्रह की प्रवृत्ति ही लोभ है। सेठ लक्ष्मीचंद के दृष्टांत के माध्यम से उन्होंने समझाया कि थोड़े से लाभ और मुफ्त की वस्तु का लोभ भी व्यक्ति को संकट में डाल सकता है।
वहीं जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि मृत्यु के बाद औदारिक शरीर छूट जाता है, लेकिन तैजस और कार्मण शरीर आत्मा के साथ रहते हैं तथा जीव के कर्मों का सूक्ष्म लेखा कर्म शरीर में बंधता रहता है। जैन दर्शन में सुख-दुख का कारण कोई बाहरी विधाता नहीं, बल्कि जीव के अपने कर्म हैं। कर्मों का फल भोगे बिना उनसे मुक्ति संभव नहीं। मन, वचन और कर्म से किए गए शुभ-अशुभ भाव भविष्य के परिणाम निर्धारित करते हैं। इसलिए क्रोध, हिंसा, अहंकार और कटु वाणी से बचते हुए प्रतिक्रिया के बजाय विवेकपूर्ण उत्तर देना चाहिए। सूरज बम्ब के 11 उपवास की तपस्या पूर्णाहुती पर गौतमचन्द बोथरा ने 5 उपवास का संकल्प लेकर बहुमान किया। सीमा गादिया ने 5 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। धर्मसभा में चेन्नई से पुखराज चोपड़ा, उत्तमचन्द भंसाली, मनोहर लोढ़ा सहित बेंगलुरु के उपनगरों से निहालचन्द कांकलिया, विजय धोका,चंदूलाल सोलंकी, कोयम्बतूर से इन्द्रचन्द्र कोठारी आदि उपस्थित थे। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने स्वागत किया। मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया। कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी।
12 व्रत आत्मशुद्धि, संयम और कर्मनिर्जरा का मार्ग : संतों ने बताया लोभ-विवेक व कर्म सिद्धांत का मर्म

