नयी दिल्ली। देश की प्रतिष्ठित और सबसे पुरानी बहुभाषीय समाचार एजेंसियों में से एक, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) के दिल्ली स्थित मुख्यालय को जबरन सील किए जाने और दिल्ली पुलिस की बर्बरतापूर्ण की गयी कार्रवाई की निंदा का क्रम रविवार को भी जारी रहा। देश के विभिन्न् संगठनों ने इस कदम को निंदनीय बताया और इसे ‘प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला’ करार दिया है।
इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन (आईजेयू) ने दिल्ली में यूएनआई कार्यालय को जबरन सील किए जाने पर गहरा रोष व्यक्त किया है। आईजेयू के अध्यक्ष के. श्रीनिवास रेड्डी और महासचिव बलविंदर सिंह जम्मू ने एक संयुक्त बयान में कहा कि रफी मार्ग स्थित कार्यालय को जिस तरह से कब्जे में लिया गया, वह चौंकाने वाला है। उन्होंने दिल्ली पुलिस और एल एंड डीओ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए इसे देशभर के पत्रकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
आईजेयू ने इस पूरी कार्रवाई को “प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला” और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अपमान करार दिया है। संगठन का आरोप है कि यह कदम बिना किसी पूर्व सूचना के उठाया गया, जिससे कर्मचारियों को अपना निजी सामान तक निकालने का अवसर नहीं मिला। आईजेयू नेताओं के अनुसार, यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय किसी “पुलिस छापे” जैसी कार्रवाई प्रतीत हो रही थी। आईजेयू ने उन रिपोर्टों पर भी गहरी चिंता जताई है जिनमें कार्रवाई के दौरान महिला पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार की बात सामने आई है। यूनियन ने इस व्यवहार की व्यापक जांच कराने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि रात के समय समाचार संकलन में बाधा डालना पत्रकार समुदाय को डराने-धमकाने का प्रयास है।
लोक दल की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अखिलेश सिंह “मुन्ना” ने भदोही के चौरी में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में इस घटना की तीखी निंदा की। उन्होंने कहा कि यूएनआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को बिना नोटिस खाली कराना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए की गई यह कार्रवाई पूरी तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित है। श्री सिंह ने कहा कि भारतीय संविधान में गंभीर अपराधियों को भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है, लेकिन यहाँ सीधे कार्रवाई कर दी गई। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रेस की आवाज दबाने की ऐसी कोशिशें जारी रहीं, तो लोकदल के कार्यकर्ता सड़क से लेकर सदन तक विरोध प्रदर्शन करेंगे। उनके अनुसार, वर्तमान व्यवस्था में समाज का हर वर्ग असुरक्षित महसूस कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में भी पत्रकारों और साहित्यकारों ने यूएनआई मुख्यालय खाली कराए जाने के विरोध में बैठक कर अपना आक्रोश दर्ज कराया। प्रेस क्लब अध्यक्ष विनोद कुमार उपाध्याय ने इसे पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि बिना सूचना के ऐसी कार्रवाई करना निंदनीय है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ संवाददाता अनुराग कुमार श्रीवास्तव सहित अन्य वक्ताओं ने देशभर के पत्रकारों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि आज इस हमले का विरोध नहीं किया गया, तो भविष्य में स्वतंत्र पत्रकारिता सुरक्षित नहीं रहेगी। इस अवसर पर राजेश पांडेय और राजेंद्र उपाध्याय सहित कई प्रमुख पत्रकारों ने मामले की त्वरित जांच की मांग उठाई।
ऑल मीडिया जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (अमजा) उत्तराखंड ने यूएनआई के पत्रकारों के साथ हुए हिंसक दुर्व्यवहार की घोर निंदा की है। एसोसिएशन के अध्यक्ष बृजेंद्र हर्ष और महामंत्री रवींद्रनाथ कौशिक ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश के बहाने पत्रकारों के साथ “शत्रुवत व्यवहार” करना स्वतंत्र पत्रकारिता पर गहरा प्रहार है। अमजा ने मांग की है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाचार प्रेषण के तनावपूर्ण समय में प्रबंधन से संपर्क किए बिना ऐसी कार्रवाई करना अभूतपूर्व है। एसोसिएशन ने स्पष्ट किया कि वे यूएनआई कर्मचारी संघ के साथ हर स्तर पर सहयोग करेंगे और पत्रकारों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अमजा ने विशेष रूप से महिला पत्रकारों के साथ हुई हाथापाई की सूचनाओं को गंभीरता से लिया है। उन्होंने इसे पूरे पत्रकार समुदाय के लिए शर्मनाक बताते हुए समवेत आंदोलन का आग्रह किया है। उनका मानना है कि संपत्ति विवाद की आड़ में पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में राजनीतिक दलों, अधिवक्ताओं और पत्रकारों ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया है। कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने कहा कि भारी पुलिस बल के साथ प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी को अचानक खाली कराना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ है। जौनपुर के दीवानी न्यायालय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष सुभाष चंद्र यादव ने इस कार्रवाई को अनुचित बताते हुए कहा कि यदि कोई प्रशासनिक आदेश था, तो नियमानुसार पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था।समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष राकेश मौर्य ने इस घटना की तुलना ‘अंग्रेजी शासन’ के दौर से की है। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष संजय अस्थाना और जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष शशि मोहन सिंह क्षेम ने भी इस घटना को लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया।
गौरतलब है कि यूएनआई के दिल्ली के रफी मार्ग पर बने मुख्यालय परिसर को शहरी विकास मंत्रालय के आवंटन रद्द करने के आदेश पर बिना कोई पूर्व चेतावनी या समय देते हुए अचानक खाली कराया गया। उस समय न्यूजरूम में काम कर रहे पत्रकारों को तत्काल बाहर निकाल दिया गया, जिससे समाचार सेवाएं बाधित हुईं। इस घटना ने देश के मीडिया जगत को आंदोलित कर दिया है।
यूएनआई मुख्यालय पर सरकारी दमन और पुलिसिया बर्बरता की कार्रवाई की कई संगठनों ने निंदा की

