नई दिल्ली। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की शोधार्थी नेहा बोरा ने शांति बनाए रखने के लिए मांगे गए ‘पीस बॉन्ड’ यानी शांति बांड पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना और सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र में नागरिकों का अधिकार है। उनके अनुसार, असहमति की आवाज को सार्वजनिक शांति के लिए खतरा मानना उचित नहीं है। यह मामला दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 16 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान नेहा बोरा को पुलिस ने एहतियातन हिरासत में लिया था। यह कार्रवाई उस समय हुई, जब वह प्रदर्शन में शामिल होने जा रही थीं। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत उन्हें नोटिस जारी किया।
नोटिस में नेहा बोरा को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate—SEM) के समक्ष उपस्थित होकर यह बताने के लिए कहा गया कि शांति बनाए रखने के लिए उनसे ₹10,000 का निजी बांड और एक जमानतदार क्यों न मांगा जाए। यह कार्यवाही जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने की आशंका से संबंधित थी।
नेहा बोरा ने पुलिस के नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी ओर से दलील दी गई कि नोटिस में लगाए गए आरोप स्पष्ट नहीं हैं और शांतिभंग की आशंका के समर्थन में पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। उन्होंने निवारक कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे शांतिपूर्ण विरोध और असहमति के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला बताया।
23 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने माना कि विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध थी और नोटिस केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं था। हालांकि, अदालत ने संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और अपना पक्ष रखने का अवसर देने से जुड़े निर्देश भी दिए।
24 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित CPI(ML) लिबरेशन के संसदीय कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेहा बोरा ने स्पष्ट किया कि वह शांति बांड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि नागरिक सरकार से सवाल नहीं पूछेंगे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं करेंगे, तो लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार कैसे सुरक्षित रहेगा?
बोरा का कहना है कि संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है। उनके अनुसार, सरकार की नीतियों की आलोचना करना या चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाना अपने आप में शांति भंग करने के समान नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी लड़ाई शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को अपराध या अशांति के रूप में प्रस्तुत किए जाने के खिलाफ है। AISA का रुख है कि शांति बांड की प्रक्रिया को इस तरह सामान्य नहीं बनाया जाना चाहिए, जिससे लोग विरोध दर्ज कराने से डरने लगें।
‘शांति बांड’ पर हस्ताक्षर करने से नेहा बोरा का इनकार, उल्टे कर दिए सवाल

