✅होली पर आचार्यश्री ने नमस्कार महामंत्र संग रंगों का कराया ध्यान
✅केरल यात्रा के अंतिम पड़ाव स्थल बना परास्सला स्थित भारतीय विद्यापीठम सेण्ट्रल स्कूल
✅आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं व गृहस्थों को समता की साधना करने की दी प्रेरणा
तिरुवनंतपुरम (केरल): ‘ईश्वर का अपना घर’ कहे जाने वाले भारत के दक्षिण-पश्चिम भाग में अवस्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण केरल की धरती को अपनी पावन प्रेरणा से आध्यात्मिक रूप से भी परिपूर्ण बनाने के लिए केरल राज्य की सीमा में लगभग एक माह से गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को अहिंसा यात्रा के साथ तिरुवनंतपुरम जिले परास्सला गांव स्थित भारतीय विद्यापीठम सेण्ट्रल स्कूल परिसर में पधारे। चालीस से अधिक नदियों व सागर के किनारे अवस्थित इस राज्य में आचार्यश्री ने ज्ञानगंगा की ऐसी अविरल धारा प्रवाहित की है, जिसने जन-जन मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन ही नहीं, बल्कि उनमें मानवता को भी जागृत करने का काम किया है।
अविरल ज्ञानगंगा प्रवाहित करने वाले आचार्यश्री ने बुधवार को होली के अवसर पर समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आध्यात्मिक रंग से सराबोर किया।
आचार्यश्री के साथ इस नयी आध्यात्मिक होली ने मानों सभी के जीवन में आध्यात्मिकता के रंग भर दिए। आचार्यश्री ने होली के अवसर समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के साथ नमस्कार महामंत्र पर आधारित विभिन्न केन्द्रों पर रंगों का ध्यान कराया। आचार्यश्री का एक-एक प्रयोग लोगों को जीवन में आध्यात्मिकता के रंग भर रहा था। आचार्यश्री के इस प्रयोग से केवल चारित्रात्माएं ही नहीं, बल्कि समुपस्थित श्रद्धालु और अन्य स्थानीय लोग भी आध्यात्मिकता के रंग में मानों रंगे नजर आ रहे थे।
इसके पूर्व अपनी ज्ञानगंगा की अविरल धारा को प्रवाहित करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को प्रातः की मंगल बेला में नेय्यट्टिनकारा स्थित डाॅ. जी.आर. हाॅल आॅफ कल्चर से मंगल प्रस्थान किया। लगभग बारह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री परास्सला स्थित भारतीय विद्यापीठम सेण्ट्रल स्कूल परिसर में पधारे। विद्या संस्थान से जुड़े पदाधिकारियों व शिक्षकों आदि ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनन्दन किया। देश भर में मनाए जा रहे होली के त्यौहार का दिन और उसके साथ चतुर्दशी तिथि का संयोग तो आज आचार्यश्री के चारों ओर चतुर्विध धर्मसंघ उपस्थित था। आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में प्रसन्नता, चित्त की समाधि और शांति का होना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। इसके लिए चारित्रात्माओं और गृहस्थों को भी समता की साधना के द्वारा अपने आपको विशेष प्रसन्न बनाने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को समता की साधना करने की विशेष पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु के लिए स्थितियां अनुकूल हों अथवा प्रतिकूल उनमें समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। संतोष करना भी समता की साधना का एक अंग है। परिश्रम के बाद भी निंदा-आलोचना को सह लेना बहुत बड़ी बात होती है। साधु को कभी न्यायालय में भी जाना पड़े तो उसे यथार्थ से पीछे नहीं हटना चाहिए और उसे आवेश, गुस्से में भी नहीं आना चाहिए। समता रखने का प्रयास करना चाहिए। उसी प्रकार कोई न्यायाधीश हो तो उसे सही फैसला करने का प्रयास करना चाहिए। कोई पेशे से वकील भी हो तो वह झूठे केस को स्वीकार न करे तो अच्छी बात हो सकती है। विपरित परिस्थितियां तो मानों परीक्षा की घड़ी होती हैं उसमें समता की साधना के साथ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार चारित्रात्माएं समता की साधना करने का प्रयास करें तो उन्नति की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
आचार्यश्री ने ‘हाजरी’ का वाचन करते हुए कहा कि साधुओं के तेरह नियम तेरह करोड़ की सम्पत्ति के अनुसार है। इनकी यत्नापूर्वक सुरक्षा करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में समुपस्थित बालमुनियों से कुछ प्रश्न भी पूछे और उन्हें प्रेरित भी किया। साध्वी आगमप्रभाजी और साध्वी मध्यस्थप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात् समुपस्थित समस्त चारित्रात्माओं ने लेखपत्र का सश्रद्धा उच्चारण किया। इस अवसर पर महाश्रमणी साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान की।
आचार्यश्री के आगमन से आह्लादित विद्या भारती संस्थान के केरल संस्कृत विभाग के प्रमुख श्री कान्दलुर सजी ने आचार्यश्री की अभ्यर्थना में संस्कृत भाषा में अपने भावोद्गार अभिव्यक्त किए तो आचार्यश्री ने भी उन्हें संस्कृत भाषा में ही आशीष प्रदान करते हुए विद्यालय के लिए पावन आशीर्वाद प्रदान किया।

